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Kumar Aryan
ham jo apne ghar men khulkar ro pade
ham jo apne ghar men khulkar ro pade | हम जो अपने घर में खुलकर रो पड़े
- Kumar Aryan
हम
जो
अपने
घर
में
खुलकर
रो
पड़े
सुनते
हीं
सारे
सितमगर
रो
पड़े
एक
मुद्दत
हो
चुकी
थी
बिन
मिले
मिलते
ही
भाई
सहोदर
रो
पड़े
देखकर
इक
वीर
की
बेवा
को
तो
हाथ
की
चूड़ी
महावर
रो
पड़े
चाक
दामन
इस
तरह
मेरा
हुआ
सीते
सीते
ही
रफ़ूगर
रो
पड़े
घर
मेरे
आए
हुए
मेहमान
सब
देखकर
के
टूटी
छप्पर
रो
पड़े
जिसको
पाने
के
लिए
रोते
थे
हम
जब
उसे
पाया
तो
पाकर
रो
पड़े
आदमी
को
आदमी
कैसे
कहें
देखकर
जिसको
पयम्बर
रो
पड़े
क्या
शिकायत
हो
ज़माने
भर
की
जब
सर
लगे
अपनों
के
पत्थर
रो
पड़े
नज़्म
ऐसी
थी
मियाँ
के
क्या
कहें
बज़्म
में
सारे
सुख़न-वर
रो
पड़े
- Kumar Aryan
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सोचना
ही
बंद
कर
दो
क्या
कहेगा
ये
ज़माना
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अपना
दुख
सुख
कह
सके
खुलकर
के
जिसके
सामने
ज़िन्दगी
में
ऐसा
भी
इक
यार
होना
चाहिए
Kumar Aryan
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सुना
है
दिल
पे
पत्थर
रखने
से
दुख
दूर
होता
है
चलो
हम
आज
पत्थर
रख
के
दिल
पर
देख
लेते
हैं
Kumar Aryan
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वो
फूल
है
या
शूल
है
क़ुबूल
है
या
रास्ते
की
धूल
है
क़ुबूल
है
किसी
के
साथ
उम्र
भर
निबाह
हो
ये
सोचना
फ़ुज़ूल
है
क़ुबूल
है
ये
इश्क़-ओ-अक़्ल
में
है
दुश्मनी
बहुत
वो
फूल
या
बबूल
है
क़ुबूल
है
किसी
का
साथ
देना
सख़्त
राह
पर
ये
ज़िन्दगी
का
मूल
है
क़ुबूल
है
चलाया
जिसने
नेक
राह
आजतक
वो
राम
है
रसूल
है
क़ुबूल
है
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Kumar Aryan
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कैसे
हुई
है
तर्बियत
ये
जानता
हूँ
मैं
ऐ
साँप
के
बच्चे
तुझे
पहचानता
हूँ
मैं
Kumar Aryan
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