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Rohan Hamirpuriya
likh zulm ko ab zulm tu
likh zulm ko ab zulm tu | लिख ज़ुल्म को अब ज़ुल्म तू
- Rohan Hamirpuriya
लिख
ज़ुल्म
को
अब
ज़ुल्म
तू
और
जंग
का
ऐलान
कर
- Rohan Hamirpuriya
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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माँ
बाप
और
उस्ताद
सब
हैं
ख़ुदा
की
रहमत
है
रोक-टोक
उन
की
हक़
में
तुम्हारे
नेमत
Altaf Hussain Hali
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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ये
कब
कहते
हैं
कि
आकर
हमको
गले
लगा
ले
वो
मिल
जाए
तो
रस्मन
ही
बस
हाथ
मिला
ले
काफ़ी
है
इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
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Vashu Pandey
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और
बेहतर,
और
बेहतर,
और
बेहतर
का
ये
खेल
मुझ
सेे
मेरे
शे'र
की
मासूमियत
ले
जाएगा
Divy Kamaldhwaj
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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ये
मैंने
कब
कहा
कि
मेरे
हक़
में
फ़ैसला
करे
अगर
वो
मुझ
से
ख़ुश
नहीं
है
तो
मुझे
जुदा
करे
मैं
उसके
साथ
जिस
तरह
गुज़ारता
हूँ
ज़िंदगी
उसे
तो
चाहिए
कि
मेरा
शुक्रिया
अदा
करे
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Tehzeeb Hafi
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ज़ालिम
था
वो
और
ज़ुल्म
की
आदत
भी
बहुत
थी
मजबूर
थे
हम
उस
से
मोहब्बत
भी
बहुत
थी
Kaleem Aajiz
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हमेशा
इक
दूसरे
के
हक़
में
दु'आ
करेंगे
ये
तय
हुआ
था
मिलें
या
बिछड़ें
मगर
तुम्हीं
से
वफ़ा
करेंगे
ये
तय
हुआ
था
Shabeena Adeeb
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ओ
सखी
मन
उसका
तो
तन
भी
उसी
का
हक़
है
उसको
ग़ैर
ये
आँगन
न
चू
में
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Neeraj Neer
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कुछ
इस
वजह
से
भी
वो
मुझ
सेे
दूर
है
पहले
से
उसकी
माँग
में
सिंदूर
है
Rohan Hamirpuriya
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हमने
सारे
बाल
अपने
नोच
डाले
उसको
पाने
के
तरीक़े
सोच
डाले
Rohan Hamirpuriya
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अपने
ज़ख़्मों
पे
उसकी
नज़र
चाहिए
यानी
अपनी
दु'आ
का
असर
चाहिए
कैसा
होगा
जुदा
मुझ
सेे
हो
कर
के
वो
उसका
है
हाल
क्या
ये
ख़बर
चाहिए
जो
बचा
ले
मुझे
ग़म
की
हर
धूप
से
ऐसा
माँ
नाम
का
इक
शजर
चाहिए
हो
उसे
नाज़
मेरी
वफ़ा
पर
सदा
आशिक़ी
में
मुझे
ये
हुनर
चाहिए
मैं
भटकता
रहूँ
तन्हा
कब
तक
बता
तेरी
बाहों
में
अपना
बसर
चाहिए
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Rohan Hamirpuriya
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वो
पूछ
लेता
अगर
हाल
मेरा
अच्छा
गुज़र
जाता
ये
साल
मेरा
ऐसे
नहीं
वो
नज़र
आने
वाला
बिस्तर
ही
कूचे
में
अब
डाल
मेरा
माज़ी
का
अफ़साना
भूला
नहीं
हूँ
गुज़रा
वो
कल
ही
है
फिलहाल
मेरा
आई
नहीं
रास
तेरी
मुहब्बत
सौदा
ये
बन
बैठा
जंजाल
मेरा
मौका
है
ये
आज़माने
का
उस
को
आगे
का
रस्ता
है
पामाल
मेरा
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Rohan Hamirpuriya
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किरदार
मुख़्तसर
था
मैं
उसकी
कहानी
में
कारीगरी
मेरी
भी
फ़साने
में
आ
गई
Rohan Hamirpuriya
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