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Divy Kamaldhwaj
aur behtar aur behtar aur behtar ka ye khel
aur behtar aur behtar aur behtar ka ye khel | और बेहतर, और बेहतर, और बेहतर का ये खेल
- Divy Kamaldhwaj
और
बेहतर,
और
बेहतर,
और
बेहतर
का
ये
खेल
मुझ
सेे
मेरे
शे'र
की
मासूमियत
ले
जाएगा
- Divy Kamaldhwaj
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इस
ज़िन्दगी
में
इतनी
फ़राग़त
किसे
नसीब
इतना
न
याद
आ
कि
तुझे
भूल
जाएँ
हम
Ahmad Faraz
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इस
गए
साल
बड़े
ज़ुल्म
हुए
हैं
मुझ
पर
ऐ
नए
साल
मसीहा
की
तरह
मिल
मुझ
से
Sarfraz Nawaz
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तबक़ों
में
रंग-ओ-नस्ल
के
उलझा
के
रख
दिया
ये
ज़ुल्म
आदमी
ने
किया
आदमी
के
साथ
Bakhtiyar Ziya
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मेरा
क़ातिल
ही
मेरा
मुंसिफ़
है
क्या
मिरे
हक़
में
फ़ैसला
देगा
Sudarshan Fakir
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हुस्न
को
भी
कहाँ
नसीब
'जिगर'
वो
जो
इक
शय
मिरी
निगाह
में
है
Jigar Moradabadi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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हम
अम्न
चाहते
हैं
मगर
ज़ुल्म
के
ख़िलाफ़
गर
जंग
लाज़मी
है
तो
फिर
जंग
ही
सही
Sahir Ludhianvi
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टक
गोर-ए-ग़रीबाँ
की
कर
सैर
कि
दुनिया
में
उन
ज़ुल्म-रसीदों
पर
क्या
क्या
न
हुआ
होगा
Meer Taqi Meer
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मुझको
बदन
नसीब
था
पर
रूह
के
बग़ैर
उसने
दिया
भी
फूल
तो
ख़ुशबू
निकाल
कर
Ankit Maurya
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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तुम्हें
ज़रूरत
क्या
कोई
त्योहारों
की
रंग
लगाकर
गले
लगाने
आ
जाओ
Divy Kamaldhwaj
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पहले
कोई
कोशिश
करके
तो
देखे
हम
इतने
भी
सख़्त
नहीं
दुनिया
वालों
Divy Kamaldhwaj
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नहीं
लगता
कहीं
भी
दिल
हमारा
सभी
को
आज़माते
फिर
रहे
हैं
Divy Kamaldhwaj
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मैं
किसी
के
पास
जाता
ही
नहीं
दूर
होकर
मन
नहीं
लगता
मेरा
Divy Kamaldhwaj
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अँधेरा
खो
गया
है
गाँव
वालों
सवेरा
हो
गया
है
गाँव
वालों
तुम्हें
अब
जागना
ख़ुद
ही
पड़ेगा
ये
मुर्गा
सो
गया
है
गाँव
वालों
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Divy Kamaldhwaj
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