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Khalid Azad
thake hue jo parindon pe ghaat lag jaa.e
thake hue jo parindon pe ghaat lag jaa.e | थके हुए जो परिंदों पे घात लग जाए
- Khalid Azad
थके
हुए
जो
परिंदों
पे
घात
लग
जाए
ख़ुदा
करे
उन्हें
मेरी
हयात
लग
जाए
इस
इक
गुमान
में
सब
कुछ
लुटा
दिया
हमने
कभी
हमारा
भी
नंबर
ये
सात
लग
जाए
तुम्हारे
ग़म
को
मैं
अपने
नसीब
में
लिख
लूँ
अगर
ये
लौह-ए-क़लम
मेरे
हाथ
लग
जाए
- Khalid Azad
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शौक़,लत,आवारगी,अय्याशी
में
गुज़री
हमारी
ज़िन्दगी
अब
तू
मुनासिब
सी
सज़ा
दे
गिनती
करके
Kartik tripathi
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बद-हवा
सेी
है
बे-ख़याली
है
क्या
ये
हालत
भी
कोई
हालत
है
ज़िंदगी
से
है
जंग
शाम-ओ-सहर
मौत
से
शिकवा
है
शिकायत
है
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Chandan Sharma
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हर
एक
काम
है
धोका
हर
एक
काम
है
खेल
कि
ज़िंदगी
में
तमाशा
बहुत
ज़रूरी
है
Khaleel Mamoon
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ज़िंदगी
यूँँही
बहुत
कम
है
मोहब्बत
के
लिए
रूठ
कर
वक़्त
गँवाने
की
ज़रूरत
क्या
है
Unknown
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दुख
की
दीमक
अगर
नहीं
लगती
ज़िन्दगी
किस
क़द्र
हसीं
लगती
वस्ल
को
लॉटरी
समझता
हूँ
लॉटरी
रोज़
तो
नहीं
लगती
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Azbar Safeer
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धूप
में
निकलो
घटाओं
में
नहा
कर
देखो
ज़िंदगी
क्या
है
किताबों
को
हटा
कर
देखो
Nida Fazli
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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मुझे
चाह
थी
किसी
और
की,
प
मुझे
मिला
कोई
और
है
मेरी
ज़िन्दगी
का
है
और
सच,
मेरे
ख़्वाब
सा
कोई
और
है
तू
क़रीब
था
मेरे
जिस्म
के,
बड़ा
दूर
था
मेरी
रूह
से
तू
मेरे
लिए
मेरे
हमनशीं
कोई
और
था
कोई
और
है
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Avtar Singh Jasser
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हम
हैं
ना!
ये
जो
मुझ
सेे
कहते
हैं
ख़ुद
किसी
और
के
भरोसे
हैं
ज़िंदगी
के
लिए
बताओ
कुछ
ख़ुद-कुशी
के
तो
सौ
तरीक़े
हैं
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Vikram Gaur Vairagi
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ग़म-ए-हयात
में
यूँँ
ढह
गया
नसीब
का
घर
कि
जैसे
बाढ़
में
डूबा
हुआ
गरीब
का
घर
वबायें
आती
गईं
और
लोग
मरते
गए
हमारे
गाँव
में
था
ही
नहीं
तबीब
का
घर
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Ashraf Ali
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ज़िंदगी
से
गर
हमें
थोड़ी
बहुत
मोहलत
मिली
बैठ
कर
है
सोचना
किस
बात
की
उजरत
मिली
Khalid Azad
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कई
उदास
से
चेहरे
नज़र
में
रखता
हूँ
फिर
उस
के
बा’द
में
ख़ुद
को
सफ़र
में
रखता
हूँ
किसी
चराग़
किसी
चाँद
का
भरोसा
क्या
दो
चार
जुगनू
भी
वक़्त-ए-सहर
में
रखता
हूँ
मकाँ
बनाया
तो
भूला
नहीं
पुराने
दिन
दो
चार
ख़ाना-बदोशों
को
घर
में
रखता
हूँ
ये
और
बात
की
आँखें
ढकी
ढकी
सी
हैं
ये
एक
बात
मैं
सबको
नज़र
में
रखता
हूँ
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Khalid Azad
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अपनी
क़ीमत
लगा
के
देखूँगा
मैं
भी
बाज़ार
जा
के
देखूँगा
अब
वो
शायद
पलट
के
आ
जाए
इक
दफ़ा
फिर
बुला
के
देखूँगा
वहशतों
का
उरूज
क्या
होगा
मैं
दियों
को
बुझा
के
देखूँगा
कितना
बचता
हूँ
तेरी
ख़ातिर
मैं
ख़ुद
से
ख़ुद
को
घटा
के
देखूँगा
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Khalid Azad
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और
कुछ
रोज़
तेरे
हिज्र
का
मातम
होगा
फिर
तो
ये
दर्द
भी
घट
जाएगा
रफ़्ता
रफ़्ता
Khalid Azad
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मौत
को
ज़िंदगी
समझते
हैं
दर
हक़ीक़त
सही
समझते
हैं
मेरे
ग़म
को
कभी
नहीं
समझे
वो
जो
मेरी
हँसी
समझते
हैं
हम
से
दरिया
की
निभ
नहीं
सकती
हम
अलग
तिश्नगी
समझते
हैं
तेरी
दुनिया
ने
दी
बहुत
ठोकर
इसलिए
चेहरगी
समझते
हैं
ख़्वाब
उस
में
ही
मेरे
पलते
हैं
लोग
क्यूँ
झोपड़ी
समझते
हैं
इश्क़
पहले
पहल
समझते
थे
अब
फ़क़त
दिल-लगी
समझते
हैं
तब
कहीं
उनको
मैं
समझ
आया
जब
से
वो
शा'इरी
समझते
हैं
अपने
हाथों
को
खींच
लेते
हैं
बच्चे
अब
मुफ़लिसी
समझते
हैं
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Khalid Azad
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