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Khalid Azad
maut ko zindagi samjhte hain
maut ko zindagi samjhte hain | मौत को ज़िंदगी समझते हैं
- Khalid Azad
मौत
को
ज़िंदगी
समझते
हैं
दर
हक़ीक़त
सही
समझते
हैं
मेरे
ग़म
को
कभी
नहीं
समझे
वो
जो
मेरी
हँसी
समझते
हैं
हम
से
दरिया
की
निभ
नहीं
सकती
हम
अलग
तिश्नगी
समझते
हैं
तेरी
दुनिया
ने
दी
बहुत
ठोकर
इसलिए
चेहरगी
समझते
हैं
ख़्वाब
उस
में
ही
मेरे
पलते
हैं
लोग
क्यूँ
झोपड़ी
समझते
हैं
इश्क़
पहले
पहल
समझते
थे
अब
फ़क़त
दिल-लगी
समझते
हैं
तब
कहीं
उनको
मैं
समझ
आया
जब
से
वो
शा'इरी
समझते
हैं
अपने
हाथों
को
खींच
लेते
हैं
बच्चे
अब
मुफ़लिसी
समझते
हैं
- Khalid Azad
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जब
से
छेड़ा
है
मेरे
ज़ख़्मों
को
आ
रही
मौत
की
सदा
मुझको
Rachit Sonkar
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मौत
ने
सारी
रात
हमारी
नब्ज़
टटोली
ऐसा
मरने
का
माहौल
बनाया
हमने
घर
से
निकले
चौक
गए
फिर
पार्क
में
बैठे
तन्हाई
को
जगह-जगह
बिखराया
हमने
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Shariq Kaifi
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नींद
भी
जागती
रही
पूरे
हुए
न
ख़्वाब
भी
सुब्ह
हुई
ज़मीन
पर
रात
ढली
मज़ार
में
Adil Mansuri
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दिल
को
सुकून
रूह
को
आराम
आ
गया
मौत
आ
गई
कि
दोस्त
का
पैग़ाम
आ
गया
Jigar Moradabadi
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शायद
कि
मौत
ही
हो
मेरे
दर्द
का
इलाज
मतलब
कि
उसको
दिल
से
निकाला
न
जाएगा
Dev Niranjan
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मैं
अपनी
मौत
से
ख़ल्वत
में
मिलना
चाहता
हूँ
सो
मेरी
नाव
में
बस
मैं
हूँ
नाख़ुदा
नहीं
है
Pallav Mishra
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बहुत
से
ग़म
समेट
कर
बनाई
एक
डायरी
चुवाव
देख
रात
भर
बनाई
एक
डायरी
ये
हर्फ़
हर्फ़
लफ़्ज़
लफ़्ज़
क़ब्र
है
वरक़
वरक़
दिल-ए-हज़ीं
से
इस
क़दर
बनाई
एक
डायरी
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Aves Sayyad
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मेरे
संग-ए-मज़ार
पर
फ़रहाद
रख
के
तेशा
कहे
है
या
उस्ताद
Meer Taqi Meer
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जो
साँसों
को
गिनते
गिनते
जीता
है
उसकी
मौत
ज़रा
जल्दी
आ
जाती
है
Tanoj Dadhich
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देखो
मौत
का
मौसम
आने
वाला
है
ज़िंदा
रहना
सब
सेे
बड़ी
लड़ाई
है
Shadab Asghar
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अपने
ही
किसी
ग़म
का
मुदावा
नहीं
होता
वरना
तेरी
दुनिया
में
तो
क्या
क्या
नहीं
होता
Khalid Azad
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हमें
दरकार
है
फिर
इक
सफ़र
की
ज़रा
सा
काम
बाक़ी
रह
गया
है
Khalid Azad
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थके
हुए
जो
परिंदों
पे
घात
लग
जाए
ख़ुदा
करे
उन्हें
मेरी
हयात
लग
जाए
इस
इक
गुमान
में
सब
कुछ
लुटा
दिया
हमने
कभी
हमारा
भी
नंबर
ये
सात
लग
जाए
तुम्हारे
ग़म
को
मैं
अपने
नसीब
में
लिख
लूँ
अगर
ये
लौह-ए-क़लम
मेरे
हाथ
लग
जाए
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Khalid Azad
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उसने
फिर
से
दुखती
रग
पर
हाथ
रखा
जाते
जाते
उसने,
उसकी
बातें
की
Khalid Azad
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तस्वीर
कोई
तेरी,
ना
ही
कोई
निशानी
अब
तुझको
भुलाने
के
लिए
कुछ
भी
नहीं
है
Khalid Azad
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