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Khalid Azad
apni qeemat laga ke dekhoonga
apni qeemat laga ke dekhoonga | अपनी क़ीमत लगा के देखूँगा
- Khalid Azad
अपनी
क़ीमत
लगा
के
देखूँगा
मैं
भी
बाज़ार
जा
के
देखूँगा
अब
वो
शायद
पलट
के
आ
जाए
इक
दफ़ा
फिर
बुला
के
देखूँगा
वहशतों
का
उरूज
क्या
होगा
मैं
दियों
को
बुझा
के
देखूँगा
कितना
बचता
हूँ
तेरी
ख़ातिर
मैं
ख़ुद
से
ख़ुद
को
घटा
के
देखूँगा
- Khalid Azad
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कितनी
यादों
के
दफ़्तर
खुल
जाते
हैं
ख़्वाब
तुम्हारे
जब
मुझ
पर
खुल
जाते
हैं
मैं
पहले
हर
गाम
पे
ठोकर
खाता
था
मुझ
पे
अब
चेहरे
अक्सर
खुल
जाते
हैं
थोड़ा
सा
तुम
वक़्त
अगर
दो
तो
देखो
धीरे
धीरे
लोग
बराबर
खुल
जाते
हैं
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Khalid Azad
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तुम्हारे
ख़्वाब
आँखों
में
सजा
कर
किसी
दिल
में
ठिकाना
कर
रहे
हैं
Khalid Azad
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अब
तो
आ
जाओ
मेरा
हिज्र
मुकम्मल
कर
दो
अब
तो
सूरज
है
मेरी
साँस
का
ढलने
वाला
Khalid Azad
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टूट
के
किस
तरह
बिखर
जाऊँ
ऐसे
हालात
में
किधर
जाऊँ
तीरगी
यूँँ
बसी
है
आँखों
में
ख़ुद
की
परछाई
से
भी
डर
जाऊँ
दूर
इतना
मैं
आ
चुका
हूँ
अब
सोचता
हूँ
कि
कैसे
घर
जाऊँ
रास्ता
ख़ुद-ब-ख़ुद
ही
चलता
है
ये
अलग
बात
मैं
ठहर
जाऊँ
फिर
बुलंदी
पे
जा
के
क्या
हासिल
उसके
दिल
से
ही
गर
उतर
जाऊँ
दिल
की
आख़िर
यही
तमन्ना
है
तेरे
कूचे
से
अब
गुज़र
जाऊँ
एक
उसकी
दु'आ
से
ही
ख़ालिद
क्या
पता
डूब
कर
उभर
जाऊँ
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Khalid Azad
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ख़त्म
होगा
एक
दिन
ये
भी
सफ़र
एक
दिन
सब
राएगाँ
हो
जाएगा
Khalid Azad
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