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Meem Alif Shaz
raat ko roke rakha jis ki KHaatir ham ne
raat ko roke rakha jis ki KHaatir ham ne | रात को रोके रक्खा जिस की ख़ातिर हम ने
- Meem Alif Shaz
रात
को
रोके
रक्खा
जिस
की
ख़ातिर
हम
ने
दिन
भर
उस
को
बाहों
में
ही
सुलाए
रक्खा
- Meem Alif Shaz
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ये
एक
बात
समझने
में
रात
हो
गई
है
मैं
उस
से
जीत
गया
हूँ
कि
मात
हो
गई
है
Tehzeeb Hafi
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माँग
सिन्दूर
भरी
हाथ
हिनाई
करके
रूप
जोबन
का
ज़रा
और
निखर
आएगा
जिसके
होने
से
मेरी
रात
है
रौशन
रौशन
चाँद
में
आज
वही
अक्स
नज़र
आएगा
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Azhar Iqbal
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नींद
भी
जागती
रही
पूरे
हुए
न
ख़्वाब
भी
सुब्ह
हुई
ज़मीन
पर
रात
ढली
मज़ार
में
Adil Mansuri
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वो
मुझको
जिस
तरह
से
दुआएँ
था
दे
रहा
मैं
तो
समझ
गया
ये
क़यामत
की
रात
हैं
AMAN RAJ SINHA
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मैं
जिस
के
साथ
कई
दिन
गुज़ार
आया
हूँ
वो
मेरे
साथ
बसर
रात
क्यूँँ
नहीं
करता
Tehzeeb Hafi
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किताबें,
रिसाले
न
अख़बार
पढ़ना
मगर
दिल
को
हर
रात
इक
बार
पढ़ना
Bashir Badr
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ये
हवा
सारे
चराग़ों
को
उड़ा
ले
जाएगी
रात
ढलने
तक
यहाँ
सब
कुछ
धुआँ
हो
जाएगा
Naseer Turabi
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सखी
को
हमारी
नज़र
लग
न
जाए
उसे
ख़्वाब
में
रात
भर
देखते
हैं
Sahil Verma
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सोचता
हूँ
कि
उस
की
याद
आख़िर
अब
किसे
रात
भर
जगाती
है
Jaun Elia
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इक
रात
वो
गया
था
जहाँ
बात
रोक
के
अब
तक
रुका
हुआ
हूँ
वहीं
रात
रोक
के
Farhat Ehsaas
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उस
के
लफ़्ज़ों
के
है
मानी
किस
क़दर
जिस
की
आँखों
में
है
पानी
किस
क़दर
भूल
जाता
हूँ
मुझे
जीना
भी
है
इश्क़
में
गुम
है
जवानी
किस
क़दर
मैं
क़लंदर
था
मगर
अब
कुछ
नहीं
उसने
बदली
है
कहानी
किस
क़दर
इस
में
तो
पत्थर
भी
बहने
लगते
हैं
इस
मोहब्बत
में
रवानी
किस
क़दर
अपने
क़दमों
को
ज़मीं
पर
रख
ले
शाज़
ज़िंदगी
तेरी
है
फ़ानी
किस
क़दर
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Meem Alif Shaz
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मुझ
पे
हँसता
है
वो
आते
जाते
हुए
दर्द
दे
जाता
है
मुस्कुराते
हुए
किस
क़दर
रौशनी
थी
मिरे
जिस्म
में
बुझ
गया
हूँ
तिरे
पास
आते
हुए
ज़िन्दगी
की
हक़ीक़त
पता
चल
गई
रोया
हूँ
ख़ाक
अपनी
उड़ाते
हुए
उस
ने
जब
हाल
पूछा
मिरा
यह
हुआ
गिर
पड़ा
अपना
क़िस्सा
सुनाते
हुए
सीखा
है
कामयाबी
मिले
किस
तरह
बारिशों
में
पतंगे
उड़ाते
हुए
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Meem Alif Shaz
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मोहब्बत
में
भी
सियासत
हो
जाए
अगर
इस
में
भी
रियासत
हो
जाए
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Meem Alif Shaz
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अभी
मौसम
नहीं
आया
बिछड़ने
का
अभी
बाक़ी
है
गुंजाइश
झगड़ने
की
Meem Alif Shaz
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यह
बारिश
फिर
होगी
बरसात
का
मौसम
है
इक
घर
फिर
ढ़ह
जाएगा
मात
का
मौसम
है
Meem Alif Shaz
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