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Meem Alif Shaz
mujh pe hansta hai vo aate jaate hue
mujh pe hansta hai vo aate jaate hue | मुझ पे हँसता है वो आते जाते हुए
- Meem Alif Shaz
मुझ
पे
हँसता
है
वो
आते
जाते
हुए
दर्द
दे
जाता
है
मुस्कुराते
हुए
किस
क़दर
रौशनी
थी
मिरे
जिस्म
में
बुझ
गया
हूँ
तिरे
पास
आते
हुए
ज़िन्दगी
की
हक़ीक़त
पता
चल
गई
रोया
हूँ
ख़ाक
अपनी
उड़ाते
हुए
उस
ने
जब
हाल
पूछा
मिरा
यह
हुआ
गिर
पड़ा
अपना
क़िस्सा
सुनाते
हुए
सीखा
है
कामयाबी
मिले
किस
तरह
बारिशों
में
पतंगे
उड़ाते
हुए
- Meem Alif Shaz
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दिसंबर
की
सर्दी
है
उसके
ही
जैसी
ज़रा
सा
जो
छू
ले
बदन
काँपता
है
Amit Sharma Meet
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हवा
चली
तो
उसकी
शॉल
मेरी
छत
पे
आ
गिरी
ये
उस
बदन
के
साथ
मेरा
पहला
राब्ता
हुआ
Zia Mazkoor
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गूँजता
है
बदन
में
सन्नाटा
कोई
ख़ाली
मकान
हो
जैसे
Aanis Moin
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कभी
देखा
नहीं
जिसने
बदन
के
आगे
कुछ
भी
भला
वो
क्यूँ
मुहब्बत
जावेदाना
ढूँढता
है
Chandan Sharma
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उस
के
फ़रोग़-ए-हुस्न
से
झमके
है
सब
में
नूर
शम-ए-हरम
हो
या
हो
दिया
सोमनात
का
Meer Taqi Meer
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टूटा
तो
हूँ
मगर
अभी
बिखरा
नहीं
'फ़राज़'
मेरे
बदन
पे
जैसे
शिकस्तों
का
जाल
हो
Ahmad Faraz
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कुछ
इस
सलीक़े
से
माथे
पे
उसने
होंट
रखे
बदन
को
छोड़
के
सारी
थकन
को
चूम
लिया
Harsh saxena
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इसी
कारण
से
मैं
उसका
बदन
छूता
नहीं
यारों
मुझे
मालूम
है
क़िस्मत
में
वो
लिक्खा
नहीं
यारों
Harsh saxena
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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ख़ुद
हुस्न
से
न
पूछिए
ता'रीफ़
हुस्न
की
दीवाने
से
ये
पूछिए
दीवाना
क्यूँँ
हुआ
Ameer Imam
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तेरा
वा'दा
था
कि
तू
फिर
लौट
के
आएगा
इक
दिन
उम्र
भर
बैठे
रहे
दरवाज़े
पे
ही
इसलिए
हम
Meem Alif Shaz
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माथे
पे
बिंदी,
आँख
में
काजल
हो
गए
हो
हसीन
क्या
कहना
Meem Alif Shaz
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उस
के
घर
में
भी
बच्चे
खेलें
उस
ने
यह
सोचा
था
लेकिन
कम
रोज़ी
की
वजह
से
उस
ने
ख़ुद
को
रोका
था
Meem Alif Shaz
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बारिश
मेरा
बचपन
वापस
ले
आती
है
मैं
भी
कश्ती
ले
के
सड़क
पे
चला
जाता
हूँ
Meem Alif Shaz
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आदमी
मीठी
ज़बाँ
भूल
गया
तौबा
है
रस्ते
में
अपना
मकाँ
भूल
गया
तौबा
है
माटी
के
घर
को
सजाने
में
लगा
है
दिन
रात
उस
को
रहना
है
वहाँ
भूल
गया
तौबा
है
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Meem Alif Shaz
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