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Meem Alif Shaz
qalam bhi zang aalooda hai ab to
qalam bhi zang aalooda hai ab to | क़लम भी ज़ंग आलूदा है अब तो
- Meem Alif Shaz
क़लम
भी
ज़ंग
आलूदा
है
अब
तो
क़लम
से
ज़ुल्म
को
कैसे
मिटाए
- Meem Alif Shaz
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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डाली
है
ख़ुद
पे
ज़ुल्म
की
यूँँ
इक
मिसाल
और
उसके
बग़ैर
काट
दिया
एक
साल
और
Subhan Asad
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आख़िरी
जंग
मैं
लड़ने
के
लिए
निकला
हूँ
फिर
रहे
या
न
रहे
तेरा
दिवाना
आना
Mubarak Siddiqi
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ज़ुल्म
फिर
ज़ुल्म
है
बढ़ता
है
तो
मिट
जाता
है
ख़ून
फिर
ख़ून
है
टपकेगा
तो
जम
जाएगा
Sahir Ludhianvi
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न
छेड़
नाम-ओ-नसब
और
नस्ल-ओ-रंग
की
बात
कि
चल
निकलती
है
अक्सर
यहीं
से
जंग
की
बात
Zafar naseemi
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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जो
दोस्त
हैं
वो
माँगते
हैं
सुलह
की
दु'आ
दुश्मन
ये
चाहते
हैं
कि
आपस
में
जंग
हो
Lala Madhav Ram Jauhar
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हो
रही
थी
जंग
उसके
नाम
पर
और
वो
ही
मेरे
दुश्मनों
के
काम
आया
Shashank Shekhar Pathak
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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मुझ
सेे
जो
मुस्कुरा
के
मिला
हो
गया
उदास
ताज़ा
हवा
की
खिड़कियों
को
जंग
लग
गई
Siddharth Saaz
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हम
किसे
साथ
में
रखते
किस
को
अलग
पहली
या
दूसरी
दोनों
ही
दिल
में
थीं
Meem Alif Shaz
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ग़ज़लों
के
सब
चेहरे
अच्छे
लगते
हैं
लेकिन
इन
में
ख़ून
के
क़तरे
लगते
हैं
Meem Alif Shaz
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उस
का
नाज़ुक
दिल
हम
भी
तोड़ें
तौबा
तौबा
उस
को
उल्टे
रस्ते
पे
छोड़ें
तौबा
तौबा
हम
ने
उस
की
मोहब्बत
की
तारीफ़
बहुत
की
है
अब
उस
से
यह
रिश्ता
नहीं
जोड़ें
तौबा
तौबा
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Meem Alif Shaz
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कुछ
बोलिए,
कुछ
बोलिए,
कुछ
बोलिए
अब
हम
ने
अपने
दाग़
ख़ुद
ही
धोलिए
गर्मी
बहुत
है
और
बादल
भी
नहीं
अब
आप
ही
अपनी
ये
ज़ुल्फ़ें
खोलिए
यह
ज़ोम
हम
को
भी
फ़ना
कर
ही
न
दे
हम
इसलिए
ऊपर
से
नीचे
हो
लिए
कोई
न
कोई
तो
यहाँ
आए
कभी
हम
भी
हमेशा
बस
अकेले
रो
लिए
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Meem Alif Shaz
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हम
तेरी
इस
फ़ितरत
से
आजिज़
आ
गए
हैं
तू
सिगरेट
का
भी
करता
है
एक
तमाशा
Meem Alif Shaz
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