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Meem Alif Shaz
ham ko bhi gaav kii woh shaam bulaati hai shaaz
ham ko bhi gaav kii woh shaam bulaati hai shaaz | हम को भी गाँव की वो शाम बुलाती है शाज़
- Meem Alif Shaz
हम
को
भी
गाँव
की
वो
शाम
बुलाती
है
शाज़
पर
ये
मजबूरियाँ
घर
जाने
नहीं
देती
है
- Meem Alif Shaz
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इक
दिए
से
एक
कमरा
भी
बहुत
है
दिल
जलाने
से
ये
घर
रौशन
हुआ
है
Neeraj Neer
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ख़ून
से
जोड़ा
हुआ
हर
ईंट
ढेला
हो
गया
दो
तरफ़
चूल्हे
जले
औ'
घर
अकेला
हो
गया
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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अब
के
सावन
में
शरारत
ये
मिरे
साथ
हुई
मेरा
घर
छोड़
के
कुल
शहर
में
बरसात
हुई
Gopaldas Neeraj
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घर
की
इस
बार
मुकम्मल
मैं
तलाशी
लूँगा
ग़म
छुपा
कर
मिरे
माँ
बाप
कहाँ
रखते
थे
Unknown
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ज़मीं
पे
घर
बनाया
है
मगर
जन्नत
में
रहते
हैं
हमारी
ख़ुश-नसीबी
है
कि
हम
भारत
में
रहते
हैं
Mehshar Afridi
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कहाँ
रोते
उसे
शादी
के
घर
में
सो
इक
सूनी
सड़क
पर
आ
गए
हम
Shariq Kaifi
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मैं
ये
भी
चाहती
हूँ
तिरा
घर
बसा
रहे
और
ये
भी
चाहती
हूँ
कि
तू
अपने
घर
न
जाए
Rehana Roohi
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कुल
जोड़
घटाकर
जो
ये
संसार
का
दुख
है
उतना
तो
मिरे
इक
दिल-ए-बेज़ार
का
दुख
है
शाइर
हैं
तो
दुनिया
से
अलग
थोड़ी
हैं
लोगों
सबकी
ही
तरह
हमपे
भी
घर
बार
का
दुख
है
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Ashutosh Vdyarthi
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समझ
के
आग
लगाना
हमारे
घर
में
तुम
हमारे
घर
के
बराबर
तुम्हारा
भी
घर
है
Hafeez Banarasi
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इन
का
उठना
नहीं
है
हश्र
से
कम
घर
की
दीवार
बाप
का
साया
Unknown
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यह
तेरे
होटों
की
ज़ीनत
कैसी
है
फूलों
के
नाजुक़
गालों
के
जैसी
है
Meem Alif Shaz
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घर
पर
जाएँ
तो
कैसे
जाएँ
हम
बच्चे
फिर
पूछेंगे
क्या
लाए
हो
Meem Alif Shaz
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सच्चे
रिश्तों
का
उजाला
अब
कहाँ
रोज़
का
मिलना
मिलाना
अब
कहाँ
जब
जवाँ
थे
तोड़ी
थी
दीवार
भी
जिस्म
में
मज़बूत
काँधा
अब
कहाँ
लोग
होते
थे
बचाने
के
लिए
पर
कहीं
ऐसा
किनारा
अब
कहाँ
जो
मोहब्बत
करता
था
ख़त
लिखता
था
इश्क़
लिखने
पढ़ने
वाला
अब
कहाँ
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Meem Alif Shaz
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तेरे
इश्क़
ने
तो
ऐसे
घेरा
है
अब
मुझ
को
जैसे
कंगन
ने
तेरे
हाथों
को
घेरा
है
Meem Alif Shaz
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जब
हसद
फैला
है
तो
रहमत
नहीं
घर
के
अंदर
आज
वो
जन्नत
नहीं
इस
क़दर
बीमार
हम
भी
हो
गए
रात
में
सोने
की
भी
फ़ुर्सत
नहीं
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Meem Alif Shaz
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