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Hemant Sakunde
ik nauka uske dil ke tat par khaali tha
ik nauka uske dil ke tat par khaali tha | इक नौका उसके दिल के तट पर ख़ाली था
- Hemant Sakunde
इक
नौका
उसके
दिल
के
तट
पर
ख़ाली
था
इक
इच्छा
थी
मेरी
भी
माँझी
बनने
की
- Hemant Sakunde
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बे-आरज़ू
भी
ख़ुश
हैं
ज़माने
में
बाज़
लोग
याँ
आरज़ू
के
साथ
भी
जीना
हराम
है
Shuja Khawar
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हमें
इस
मिट्टी
से
कुछ
यूँँ
मुहब्बत
है
यहीं
पे
निकले
दम
दिल
की
ये
हसरत
है
हमें
क्यूँ
चाह
उस
दुनिया
की
हो
मौला
हमारी
तो
इसी
मिट्टी
में
जन्नत
है
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Harsh saxena
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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मुझे
ये
डर
है
तेरी
आरज़ू
न
मिट
जाए
बहुत
दिनों
से
तबीअत
मिरी
उदास
नहीं
Nasir Kazmi
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पेड़
मुझे
हसरत
से
देखा
करते
थे
मैं
जंगल
में
पानी
लाया
करता
था
Tehzeeb Hafi
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न
जी
भर
के
देखा
न
कुछ
बात
की
बड़ी
आरज़ू
थी
मुलाक़ात
की
Bashir Badr
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मिरी
आरज़ू
का
हासिल
तिरे
लब
की
मुस्कुराहट
हैं
क़ुबूल
मुझ
को
सब
ग़म
तिरी
इक
ख़ुशी
के
बदले
Kashif Adeeb Makanpuri
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ये
आरज़ू
भी
बड़ी
चीज़
है
मगर
हमदम
विसाल-ए-यार
फ़क़त
आरज़ू
की
बात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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ग़म-ए-हयात
ने
आवारा
कर
दिया
वर्ना
थी
आरज़ू
कि
तिरे
दर
पे
सुब्ह
ओ
शाम
करें
Majrooh Sultanpuri
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बहाने
और
भी
होते
जो
ज़िंदगी
के
लिए
हम
एक
बार
तिरी
आरज़ू
भी
खो
देते
Majrooh Sultanpuri
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है
सफ़र
ये
वाक़'ई
में
दूर
या
हम
सेफ़र
हमने
ग़लत
फिर
से
चुना
Hemant Sakunde
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आरसी
के
उस
तरफ़
कोई
ख़फ़ा
था
आज
आँखें
भी
न
मुझ
सेे
वो
मिलाता
Hemant Sakunde
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ऐ
ख़ुदा
कोई
नया
कर्तब
बता
दे
इस
पुराने
नाच
से
मन
उठ
गया
है
Hemant Sakunde
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मुद्दत
से
हम
इक
वहम
पाला
करते
थे
हमको
लगा
था
सब
हमी
पे
मरते
थे
हम
शे'र
लिखते
रहते
थे
इक
हुस्न
पर
उनको
लगा
था
सिर्फ़
पन्ने
भरते
थे
तौसीफ़
उसकी
इतनी
करते
थे
कि
हम
ता'रीफ़
ख़ुद
की
भूलने
से
डरते
थे
वो
ज़ीनत-ए-महफ़िल
चुरा
ले
जाती
थी
हम
तालियाँ
ही
बस
समेटा
करते
थे
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Hemant Sakunde
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आ
तुझे
इस
शा'इरी
के
दायरे
में
घेर
लूँ
पर
सुनाते
वक़्त
चेहरा
मैं
ज़रा
सा
फेर
लूँ
डूब
जाता
हूँ
किसी
मंज़र-कशी
में
देर
तक
माफ़
कर
देना
अगर
मैं
लिखने
में
कुछ
देर
लूँ
ये
ग़ज़ल
है
शे'र
है
या
नज़्म
है
मुझको
बता
हो
ग़लत
उत्तर
अगर
तो
मुँह
फुलाकर
फेर
लूँ
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Hemant Sakunde
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