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Hasan Raqim
likha tha jiske muqaddar men vo usii ka hua
likha tha jiske muqaddar men vo usii ka hua | लिखा था जिसके मुक़द्दर में वो, उसी का हुआ
- Hasan Raqim
लिखा
था
जिसके
मुक़द्दर
में
वो,
उसी
का
हुआ
वो
मेरा
होना
नहीं
था
मेरा
हुआ
भी
नहीं
- Hasan Raqim
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कहीं
गुलाल
के
हिस्से
में
कोई
गाल
नहीं
कहीं
पे
गाल
की
तक़दीर
में
गुलाल
नहीं
Harman Dinesh
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किसी
के
तुम
हो
किसी
का
ख़ुदा
है
दुनिया
में
मेरे
नसीब
में
तुम
भी
नहीं
ख़ुदा
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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न
हुआ
नसीब
क़रार-ए-जाँ
हवस-ए-क़रार
भी
अब
नहीं
तिरा
इंतिज़ार
बहुत
किया
तिरा
इंतिज़ार
भी
अब
नहीं
तुझे
क्या
ख़बर
मह-ओ-साल
ने
हमें
कैसे
ज़ख़्म
दिए
यहाँ
तिरी
यादगार
थी
इक
ख़लिश
तिरी
यादगार
भी
अब
नहीं
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Jaun Elia
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इसी
होनी
को
तो
क़िस्मत
का
लिखा
कहते
हैं
जीतने
का
जहाँ
मौक़ा
था
वहीं
मात
हुई
Manzar Bhopali
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जीत
हूँ
जश्न-ए-मुक़द्दर
हूँ
मैं
ठीक
से
देख
सिकंदर
हूँ
मैं
Ritesh Rajwada
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ख़्वाहिश
सब
रखते
हैं
तुझको
पाने
की
और
फिर
अपनी
अपनी
क़िस्मत
होती
है
Bhaskar Shukla
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तुम्हारे
ख़त
को
जलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
ये
दिल
बाहर
निकलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
तुम्हारा
फ़ैसला
है
पास
रुकना
या
नहीं
रुकना
मेरी
क़िस्मत
बदलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
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Tanoj Dadhich
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खो
दिया
तुम
को
तो
हम
पूछते
फिरते
हैं
यही
जिस
की
तक़दीर
बिगड़
जाए
वो
करता
क्या
है
Firaq Gorakhpuri
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ये
कब
कहते
हैं
कि
आकर
हमको
गले
लगा
ले
वो
मिल
जाए
तो
रस्मन
ही
बस
हाथ
मिला
ले
काफ़ी
है
इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
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Vashu Pandey
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सितारे
कुछ
बताते
हैं
नतीजा
कुछ
निकलता
है
बड़ी
हैरत
में
हैं
मेरा
मुक़द्दर
देखने
वाले
Madan Mohan Danish
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पहले
रूठा
यार
मनाना
होता
है
फिर
कोई
त्यौहार
मनाना
होता
है
उसका
क्या
है
वो
तो
बस
रो
देता
है
मुझको
ही
हर
बार
मनाना
होता
है
रिश्तों
की
बुनियाद
बसीरत
होती
है
इस
ख़ातिर
संसार
मनाना
होता
है
मैं
वो
हूँ
जो
हारा
उसकी
ख़ुशियों
से
मुझको
ग़म
भी
यार
मनाना
होता
है
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Hasan Raqim
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कर
बैठे
हो
उस
दिल
में
भी
घर
तुमको
मुबारक
वो
शख़्स
था
तो
मेरा
मगर
तुमको
मुबारक
हम
जैसे
दरख़्तों
को
ज़मीं
आख़िरी
हद
है
तुम
बादलों
के
हो
तो
ये
पर
तुमको
मुबारक
टूटे
हुए
दिल
को
है
हराम
इसका
हर
एक
जाम
इस
इश्क़
की
बोतल
का
असर
तुमको
मुबारक
मेरी
गली
से
बस
हो
गुज़र
यार
का
मेरे
बाक़ी
के
जहाँ
भर
का
गुज़र
तुमको
मुबारक
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Hasan Raqim
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साथ
उसके
इक
नया
रिश्ता
निभाने
के
लिए
याद
रक्खेंगे
उसे
लेकिन
भुलाने
के
लिए
Hasan Raqim
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पहले
होता
था
तेरा
ज़िक्र
तो
हँस
जाता
था
आज
तुझ
सेे
जुड़ी
हर
बात
पे
रो
जाता
हूँ
Hasan Raqim
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ये
सच
है
जो
भी
उस
सेे
जा
मिला
है
वो
उसके
रंग
में
ही
ढल
गया
है
कोई
कुछ
भी
नहीं
पाकर
भी
ख़ुश
है
कोई
ख़ुशियों
में
भी
ग़म
ढूँढ़ता
है
जिसे
चाहा
है
वो
गर
मिल
गया
तो
कुछ
इस
सेे
आगे
भी
अब
सोचना
है?
मुझे
तो
इश्क़
में
डिग्री
है
हासिल,
बताओ
तुम
कि
तुमने
क्या
पढ़ा
है
कोई
सहराओं
में
दरिया
से
ख़ुश
है
कोई
इस
सेे
निकलना
चाहता
है
मेरे
ग़म
को
भी
तुम
समझा
करोगे
मेरी
तुम
सेे
यही
बस
इल्तिजा
है
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Hasan Raqim
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