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Hasan Raqim
kar baithe ho us dil men bhi ghar tumko mubarak
kar baithe ho us dil men bhi ghar tumko mubarak | कर बैठे हो उस दिल में भी घर तुमको मुबारक
- Hasan Raqim
कर
बैठे
हो
उस
दिल
में
भी
घर
तुमको
मुबारक
वो
शख़्स
था
तो
मेरा
मगर
तुमको
मुबारक
हम
जैसे
दरख़्तों
को
ज़मीं
आख़िरी
हद
है
तुम
बादलों
के
हो
तो
ये
पर
तुमको
मुबारक
टूटे
हुए
दिल
को
है
हराम
इसका
हर
एक
जाम
इस
इश्क़
की
बोतल
का
असर
तुमको
मुबारक
मेरी
गली
से
बस
हो
गुज़र
यार
का
मेरे
बाक़ी
के
जहाँ
भर
का
गुज़र
तुमको
मुबारक
- Hasan Raqim
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अब
वो
तितली
है
न
वो
उम्र
तआ'क़ुब
वाली
मैं
न
कहता
था
बहुत
दूर
न
जाना
मिरे
दोस्त
Faisal Ajmi
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मज़हब
से
मेरे
क्या
तुझे
मेरा
दयार
और
मैं
और
यार
और
मिरा
कारोबार
और
Meer Taqi Meer
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इश्क़
में
पागल
हो
जाना
भी
फ़न
है
दोस्त
और
ये
दुख
की
बात
है
हम
फ़नकार
नहीं
Praveen Sharma SHAJAR
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बस
एक
ही
दोस्त
है
दुनिया
में
अपना
मगर
उस
से
भी
झगड़ा
चल
रहा
है
Zubair Ali Tabish
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बहुत
चल
बसे
यार
ऐ
ज़िंदगी
कोई
दिन
की
मेहमान
तू
रह
गई
Dagh Dehlvi
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एक
आवाज़
कि
जो
मुझको
बचा
लेती
है
ज़िन्दगी
आख़री
लम्हों
में
मना
लेती
है
जिस
पे
मरती
हो
उसे
मुड़
के
नहीं
देखती
वो
और
जिसे
मारना
हो
यार
बना
लेती
है
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Ali Zaryoun
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उसको
जो
कुछ
भी
कहूँ
अच्छा
बुरा
कुछ
न
करे
यार
मेरा
है
मगर
काम
मेरा
कुछ
न
करे
दूसरी
बार
भी
पड़
जाए
अगर
कुछ
करना
आदमी
पहली
मोहब्बत
के
सिवा
कुछ
न
करे
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Abid Malik
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मकाँ
तो
है
नहीं
जो
खींच
दें
दीवार
इस
दिल
में
कोई
दूजा
नहीं
रह
पाएगा
अब
यार
इस
दिल
में
जहाँ
भर
में
लुटाते
फिर
रहे
है
कम
नहीं
होता
तुम्हारे
वास्ते
इतना
रखा
था
प्यार
इस
दिल
में
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Bhaskar Shukla
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इस
से
पहले
कि
बे-वफ़ा
हो
जाएँ
क्यूँँ
न
ऐ
दोस्त
हम
जुदा
हो
जाएँ
Ahmad Faraz
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मेरा
हर
दिन
तेरी
फ़ुर्क़त
में
बसर
होता
है
यार
होना
तो
नहीं
चाहिए,
पर
होता
है
Harman Dinesh
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कुछ
ऐसे
काम
वो
अपना
निकाल
लेता
है
के
हर
किसी
से
ही
रिश्ता
निकाल
लेता
है
है
इक
चिराग़
के
मानिंद
कोई
इस
दिल
में
कि
मेरे
दिल
से
अँधेरा
निकाल
लेता
है
ज़रूरतों
से
घिरा
आदमी
भी
मुश्किल
में
पहाड़
काट
के
रस्ता
निकाल
लेता
है
वो
इम्तिहान-ए-ज़िंदगी
में
जब
अटकता
है
तो
फिर
दु'आओं
का
पर्चा
निकाल
लेता
है
वो
इसकी
क़ैद
से
आज़ाद
हो
निकलता
है
जो
दिल
से
ख़्वाहिश-ए-दुनिया
निकाल
लेता
है
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Hasan Raqim
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असर
ये
माँ
की
दु'आओं
का
ही
तो
है
ऐ
दोस्त
कि
होते
होते
कोई
हादसा
नहीं
होता
Hasan Raqim
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वा'दा
करो
कि
रंज-ओ-मुसीबत
के
दौर
में
मेरे
लिए
दु'आ
में
उठाओगे
हाथ
तुम
Hasan Raqim
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वो
क्या
लगता
है
मेरा
ये
बताते
दिन
हो
जाना
है
ये
बेहतर
है
कि
तुम
पूछो
वो
मेरा
क्या
नहीं
लगता
Hasan Raqim
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गर
उसके
दिल
से
मेरा
दिल
लगा
नहीं
होता
तो
उसके
जाने
का
मुझको
गिला
नहीं
होता
ये
ख़ामुशी,
ये
कमी,
चीखती
नहीं
होती
मोहब्बतों
का
ये
ग़म
काटता
नहीं
होता
पराए
लोग
मिले
और
कह
गए
मुझ
सेे
कि
इस
जहान
में
कोई
सगा
नहीं
होता
असर
ये
माँ
की
दु'आओं
का
ही
तो
है
ऐ
दोस्त
कि
होते
होते
कोई
हादसा
नहीं
होता
वो
लौट
आएगा
गर
ये
यक़ीं
नहीं
होता
तो
इंतज़ार
में
उसके
रुका
नहीं
होता
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Hasan Raqim
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