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Hasan Raqim
pahle rootha yaar manana hota hai
pahle rootha yaar manana hota hai | पहले रूठा यार मनाना होता है
- Hasan Raqim
पहले
रूठा
यार
मनाना
होता
है
फिर
कोई
त्यौहार
मनाना
होता
है
उसका
क्या
है
वो
तो
बस
रो
देता
है
मुझको
ही
हर
बार
मनाना
होता
है
रिश्तों
की
बुनियाद
बसीरत
होती
है
इस
ख़ातिर
संसार
मनाना
होता
है
मैं
वो
हूँ
जो
हारा
उसकी
ख़ुशियों
से
मुझको
ग़म
भी
यार
मनाना
होता
है
- Hasan Raqim
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बहुत
से
ग़म
समेट
कर
बनाई
एक
डायरी
चुवाव
देख
रात
भर
बनाई
एक
डायरी
ये
हर्फ़
हर्फ़
लफ़्ज़
लफ़्ज़
क़ब्र
है
वरक़
वरक़
दिल-ए-हज़ीं
से
इस
क़दर
बनाई
एक
डायरी
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Aves Sayyad
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मैं
ज़िन्दगी
में
आज
पहली
बार
घर
नहीं
गया
मगर
तमाम
रात
दिल
से
माँ
का
डर
नहीं
गया
बस
एक
दुख
जो
मेरे
दिल
से
उम्र
भर
न
जाएगा
उसको
किसी
के
साथ
देख
कर
मैं
मर
नहीं
गया
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Tehzeeb Hafi
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अब
क्या
ही
ग़म
मनाएँ
कि
क्या
क्या
हुआ
मियाँ
बर्बाद
होना
ही
था
सो
बर्बाद
हो
गए
shaan manral
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कुल
जोड़
घटाकर
जो
ये
संसार
का
दुख
है
उतना
तो
मिरे
इक
दिल-ए-बेज़ार
का
दुख
है
शाइर
हैं
तो
दुनिया
से
अलग
थोड़ी
हैं
लोगों
सबकी
ही
तरह
हमपे
भी
घर
बार
का
दुख
है
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Ashutosh Vdyarthi
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वक़्त
की
गर्दिशों
का
ग़म
न
करो
हौसले
मुश्किलों
में
पलते
हैं
Mahfuzur Rahman Adil
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इस
बात
पर
तू
हाथ
मिला
अब
तेरी
तरह
ग़म
का
लिबास
ओढ़
के
बैठा
हुआ
हूँ
मैं
shaan manral
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शिकस्ता
दिल
शब-ए-ग़म
दर्द
रुसवाई
अरे
इतना
तो
चलता
है
मुहब्बत
में
Sapna Moolchandani
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अपनी
तबाहियों
का
मुझे
कोई
ग़म
नहीं
तुम
ने
किसी
के
साथ
मोहब्बत
निभा
तो
दी
Sahir Ludhianvi
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ख़ुदा
की
शा'इरी
होती
है
औरत
जिसे
पैरों
तले
रौंदा
गया
है
तुम्हें
दिल
के
चले
जाने
पे
क्या
ग़म
तुम्हारा
कौन
सा
अपना
गया
है
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Ali Zaryoun
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तेरे
जाने
से
ज़्यादा
हैं
न
कम
पहले
थे
हम
को
लाहक़
हैं
वही
अब
भी
जो
ग़म
पहले
थे
Afzal Khan
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ये
जिस
आग
की
बात
तुम
कर
रहे
हो
तुम
उस
आग
का
तो
धुआँ
भी
नहीं
हो
Hasan Raqim
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कुछ
हो
गया
है
हाल
ये
दिल
का
तुम्हारे
बाद
लगता
नहीं
है
कोई
भी
अपना
तुम्हारे
बाद
कितने
ही
लोग
आए
ज़िंदगी
में,
हाँ
मगर
आया
नहीं
है
कोई
भी
तुम
सा
तुम्हारे
बाद
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Hasan Raqim
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मैं
ज़िंदगी
के
दिन
ऐसे
सँवार
लेता
हूँ
कि
तेरे
साथ
में
कुछ
पल
गुज़ार
लेता
हूँ
मैं
दूसरों
की
ख़ुशी
ख़ुद
से
पहले
रखता
हूँ
जहाँ
पे
जीत
भी
सकता
हूँ
हार
लेता
हूँ
पुकारते
हैं
मुसीबत
में
लोग
अपनों
को
सो
मैं
भी
अपने
ग़मों
को
पुकार
लेता
हूँ
सँभाल
लेता
हूँ
ख़ुद
को
मैं
लड़खड़ाकर
भी
जहाँ
भी
गिरता
हूँ
रस्ते
सुधार
लेता
हूँ
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Hasan Raqim
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न
हाथ
आगे
करूँँ
सामने
सिवाए
तेरे
न
इतना
देना
कि
मुझको
ग़ुरूर
आ
जाए
Hasan Raqim
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तमाम
हैं
बिमारियाँ
मगर
तुम्हें
हुआ
है
इश्क़
तो
अब
तुम्हें
ज़रूरत-ए-दुआ
ही
है
दवा
नहीं
Hasan Raqim
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