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Dileep Kumar
kaash tum pahle mukammal baat karte
kaash tum pahle mukammal baat karte | काश! तुम पहले मुकम्मल बात करते
- Dileep Kumar
काश!
तुम
पहले
मुकम्मल
बात
करते
और
फिर
मुझ
सेे
मुसलसल
बात
करते
- Dileep Kumar
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अब
मिरा
ध्यान
कहीं
और
चला
जाता
है
अब
कोई
फ़िल्म
मुकम्मल
नहीं
देखी
जाती
Jawwad Sheikh
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मानी
हैं
मैं
ने
सैकड़ों
बातें
तमाम
उम्र
आज
आप
एक
बात
मेरी
मान
जाइए
Ameer Minai
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उस
के
होंटों
पे
रख
के
होंट
अपने
बात
ही
हम
तमाम
कर
रहे
हैं
Jaun Elia
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सुलग
रहे
थे
शजर
दिल
तमाम
भँवरों
के
दिल
अपना
वार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
बहुत
मलाल
हुआ
देखकर
गुलिस्ताँ
में
तमाचा
मार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
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Shajar Abbas
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सूरज
लिहाफ़
ओढ़
के
सोया
तमाम
रात
सर्दी
से
इक
परिंदा
दरीचे
में
मर
गया
Athar nasik
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तमाम
नाख़ुदा
साहिल
से
दूर
हो
जाएँ
समुंदरों
से
अकेले
में
बात
करनी
है
Tehzeeb Hafi
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जिस
दिन
तुम्हारे
ख़त
का
मुझे
इंतिज़ार
था
उस
दिन
तमाम
पंछी
कबूतर
लगे
मुझे
Ali Rumi
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ये
इश्क़-विश्क़
का
क़िस्सा
तमाम
हो
जाए
सफ़ेद
दाढ़ी
हवस
की
गुलाम
हो
जाए
जवान
लड़कियों
बूढ़ों
से
तुम
रहो
हुश्यार
न
जाने
कौन
कहाँ
आसाराम
हो
जाए
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Paplu Lucknawi
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देखो
तो
चश्म-ए-यार
की
जादू-निगाहियाँ
बेहोश
इक
नज़र
में
हुई
अंजुमन
तमाम
Hasrat Mohani
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कुछ
इस
तरह
से
गुज़ारी
है
ज़िन्दगी
जैसे
तमाम
उम्र
किसी
दूसरे
के
घर
में
रहा
Ahmad Faraz
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सड़कों
पर
ये
जब
तलक
जलते
रहेंगे
इनके
बच्चे
फूलते
फलते
रहेंगे
साथ
देने
वाला
जब
कोई
न
होगा
शम्स
निकलेंगे
मगर
ढलते
रहेंगे
छोड़
ये
सब
यूँँ
न
आशुफ़्ता
हो
तू
तो
ज़िंदगी
जब
तक
है
हम
चलते
रहेंगे
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Dileep Kumar
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सारी
कहानी
ही
अनसुनी
है
ये
ज़िंदगी
तो
बाज़ीगरी
है
मैं
ये
अचानक
से
सोचता
हूँ
पत्थर
सी
बन
तू
क्या
सोचती
है
ये
नाम,
इज़्ज़त,
शोहरत
नहीं
कुछ
मेरी
कमाई
इक
झोपड़ी
है
उसको
किसी
से
तो
इश्क़
है
पर
ये
बात
वो
हँस
के
टालती
है
पहले
पहल
ही
अच्छी
लगी
थी
पर
ज़हर
सी
अब
ये
ख़ामुशी
है
शामिल
नहीं
होती
जब
हवस
तो
सच्ची
मोहब्बत
सिर
चूमती
है
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Dileep Kumar
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अजब
सा
मोड़
आया
है
कहानी
में
लगायी
है
किसी
ने
आग
पानी
में
सदाक़त
की
तरफ़दारी
ज़रूरी
है
मगर
यूँँ
फ़ाइदा
है
कम-ज़बानी
में
उड़ाई
मौज
हमने
आसमानों
पर
खिलाए
गुल
कई
हमने
जवानी
में
तिरे
जैसा
न
कोई
हम
सेफ़र
हो
तो
सफ़र
ये
ख़त्म
होगा
राइगानी
में
किसी
से
भी
नहीं
जब
बात
बन
पाई
बिता
दी
उम्र
हमने
ख़ुद-ग़ुमानी
में
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Dileep Kumar
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ग़ज़ल
के
क़ाफ़िए
बदले,
ग़ज़ल
बदली
ग़ज़ल
के
फिर
म'आनी
भी
नए
रक्खे
Dileep Kumar
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छोड़
ये
सब,
यूँँ
न
आशुफ़्ता
हो
तू
तो
ज़िंदगी
जब
तक
है,
हम
चलते
रहेंगे
Dileep Kumar
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