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Dileep Kumar
ajab sa mod aaya hai kahaanii men
ajab sa mod aaya hai kahaanii men | अजब सा मोड़ आया है कहानी में
- Dileep Kumar
अजब
सा
मोड़
आया
है
कहानी
में
लगायी
है
किसी
ने
आग
पानी
में
सदाक़त
की
तरफ़दारी
ज़रूरी
है
मगर
यूँँ
फ़ाइदा
है
कम-ज़बानी
में
उड़ाई
मौज
हमने
आसमानों
पर
खिलाए
गुल
कई
हमने
जवानी
में
तिरे
जैसा
न
कोई
हम
सेफ़र
हो
तो
सफ़र
ये
ख़त्म
होगा
राइगानी
में
किसी
से
भी
नहीं
जब
बात
बन
पाई
बिता
दी
उम्र
हमने
ख़ुद-ग़ुमानी
में
- Dileep Kumar
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हस्ती
का
नज़ारा
क्या
कहिए
मरता
है
कोई
जीता
है
कोई
जैसे
कि
दिवाली
हो
कि
दिया
जलता
जाए
बुझता
जाए
Nushur Wahidi
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जो
तेरी
बाँहों
में
हँसती
रही
है
खेली
है
वो
लड़की
राज़
नहीं
है
कोई
पहेली
है
हाँ
मेरा
हाथ
पकड़
कर
झटक
दिया
उसने
सहारा
दे
के
बताया
कि
तू
अकेली
है
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Tajdeed Qaiser
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ग़म-ए-हयात
ने
आवारा
कर
दिया
वर्ना
थी
आरज़ू
कि
तिरे
दर
पे
सुब्ह
ओ
शाम
करें
Majrooh Sultanpuri
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वो
आँखें
आपके
ग़म
में
नहीं
हुई
हैं
नम
दिया
जलाते
हुए
हाथ
जल
गया
होगा
Shadab Javed
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क्या
ख़ूब
तुम
ने
ग़ैर
को
बोसा
नहीं
दिया
बस
चुप
रहो
हमारे
भी
मुँह
में
ज़बान
है
Mirza Ghalib
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न
रूई
हो
तो
अपने
अश्कों
से
बाती
बनाएँगे
बुझा
दीया
हमारा
तो
हवा
से
लड़
भी
जाएँगे
बनाई
रोज़
चौदह
साल
रंगोली
बस
इस
ख़ातिर
न
जाने
रामजी
वनवास
से
कब
लौट
आएंँगे
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Krishnakant Kabk
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समझ
के
आग
लगाना
हमारे
घर
में
तुम
हमारे
घर
के
बराबर
तुम्हारा
भी
घर
है
Hafeez Banarasi
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कितनी
उजलत
में
मिटा
डाला
गया
आग
में
सब
कुछ
जला
डाला
गया
Manish Shukla
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दिया
जला
के
सभी
बाम-ओ-दर
में
रखते
हैं
और
एक
हम
हैं
इसे
रह-गुज़र
में
रखते
हैं
समुंदरों
को
भी
मालूम
है
हमारा
मिज़ाज
कि
हम
तो
पहला
क़दम
ही
भँवर
में
रखते
हैं
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Abrar Kashif
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लो
आज
हमने
तोड़
दिया
रिश्ता-ए-उम्मीद
लो
अब
कभी
गिला
न
करेंगे
किसी
से
हम
Sahir Ludhianvi
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जब
ख़बर
सनसनी
सी
रही
भीड़
कुछ
दिन
बनी
सी
रही
ख़्वाब
देखा
तिरा
जब
कभी
नींद
से
दुश्मनी
सी
रही
मैं
तिरे
बाद
भी
ख़ुश
था
पर
ज़िन्दगी
अन-मनी
सी
रही
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Dileep Kumar
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ज़ेहन
में
पिंदार
ही
पिंदार
है
पर
अकेले
चलना
भी
दुश्वार
है
और
कोई
मसअला
भी
अब
नहीं
दरमियाँ
बस
एक
ही
दीवार
है
चाय
क्या
पीते
ख़बर
क्या
पढ़ते
हम
ख़ून
से
लथपथ
जो
ये
अख़बार
है
जीत
से
पहले
अलग
हैं,
बाद
में
नेता
लोगों
के
अलग
किरदार
है
हम
करें
शिकवा
भी
तो
किस
से
करें
जब
हमारे
दोस्त
ही
दो-चार
है
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Dileep Kumar
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ग़ुरूर
भी
बहुत
हैं
और
दिलकशी
नहीं
रही
तिरे
बिना
ये
ज़िंदगी
भी
ज़िंदगी
नहीं
रही
मिलें
हैं
आज
तीन-चार
साल
बाद
हम
कहीं
मगर
लबों
पे
उस
के
वो
शिकस्तगी
नहीं
रही
सभी
ही
तोड़ते
रहे
किसी
तरह
से
दिल
मिरा
मगर
मिरी
किसी
से
बे-त'अल्लुक़ी
नहीं
रही
ये
एक
शख़्स
का
मलाल
सीख
दे
गया
मुझे
जहाँ
में
अब
'दिलीप'
आदमी-गरी
नहीं
रही
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Dileep Kumar
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जिस
किसी
से
तेरा
चक्कर
चल
रहा
था
उसको
मैं
अच्छी
तरह
से
जानता
था
रातें
रौशन
थी
किसी
की
तुझ
सेे
दिलबर
तो
किसी
का
तेरे
बा'इस
रत-जगा
था
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Dileep Kumar
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इक
आदमी
भी
जब
नहीं
राज़ी
लतीफ़ों
के
लिए
फिर
तो
बचा
ही
कुछ
नहीं
हैं
हम
दरख़्तों
के
लिए
जो
ज़हर
फैलाने
लगी
है
हर
तरफ़
से
हर
कहीं
कोई
दवा
है
तो
बताओ
उन
हवाओं
के
लिए
किस
बात
पर
तुम
ने
भरोसा
कर
लिया
उस
शख़्स
का
मशहूर
है
जो
शहर
भर
में
बस
फ़सानों
के
लिए
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Dileep Kumar
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