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Dileep Kumar
saari kahaanii hi ansuni hai
saari kahaanii hi ansuni hai | सारी कहानी ही अनसुनी है
- Dileep Kumar
सारी
कहानी
ही
अनसुनी
है
ये
ज़िंदगी
तो
बाज़ीगरी
है
मैं
ये
अचानक
से
सोचता
हूँ
पत्थर
सी
बन
तू
क्या
सोचती
है
ये
नाम,
इज़्ज़त,
शोहरत
नहीं
कुछ
मेरी
कमाई
इक
झोपड़ी
है
उसको
किसी
से
तो
इश्क़
है
पर
ये
बात
वो
हँस
के
टालती
है
पहले
पहल
ही
अच्छी
लगी
थी
पर
ज़हर
सी
अब
ये
ख़ामुशी
है
शामिल
नहीं
होती
जब
हवस
तो
सच्ची
मोहब्बत
सिर
चूमती
है
- Dileep Kumar
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तू
मोहब्बत
नहीं
समझती
है
हम
भी
अपनी
अना
में
जलते
हैं
इस
दफा
बंदिशें
ज़ियादा
हैं
छोड़
अगले
जनम
में
मिलते
हैं
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Ritesh Rajwada
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तुम्हें
लगा
है
कि
मेरे
होते,
तुम्हें
भी
दिल
में
जगह
मिलेगी
बड़ी
ही
इज़्ज़त
से
कह
रहा
हूँ
,चलो
उठो
अब
मेरी
जगह
से
Shadab Asghar
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हाँ
ठीक
है
मैं
अपनी
अना
का
मरीज़
हूँ
आख़िर
मिरे
मिज़ाज
में
क्यूँँ
दख़्ल
दे
कोई
Jaun Elia
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चादर
की
इज़्ज़त
करता
हूँ
और
पर्दे
को
मानता
हूँ
हर
पर्दा
पर्दा
नइँ
होता
इतना
मैं
भी
जानता
हूँ
Ali Zaryoun
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दिन
रात
मय-कदे
में
गुज़रती
थी
ज़िंदगी
'अख़्तर'
वो
बे-ख़ुदी
के
ज़माने
किधर
गए
Akhtar Shirani
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लड़
सको
दुनिया
से
जज़्बों
में
वो
शिद्दत
चाहिए
इश्क़
करने
के
लिए
इतनी
तो
हिम्मत
चाहिए
कम
से
कम
मैंने
छुपा
ली
देख
कर
सिगरेट
तुम्हें
और
इस
लड़के
से
तुमको
कितनी
इज़्ज़त
चाहिए
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Nadeem Shaad
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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निगल
ही
चुका
था
जफ़ा
का
निवाला
अना
फिर
तमाशा
नया
कर
रही
है
Amaan Pathan
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बे-ख़ुदी
बे-सबब
नहीं
'ग़ालिब'
कुछ
तो
है
जिस
की
पर्दा-दारी
है
Mirza Ghalib
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वक़्त
के
साथ
सब
कुछ
बदल
जाता
है
उसका
इस
झूठ
से
काम
चल
जाता
है
Dileep Kumar
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अजब
सा
मोड़
आया
है
कहानी
में
लगायी
है
किसी
ने
आग
पानी
में
सदाक़त
की
तरफ़दारी
ज़रूरी
है
मगर
यूँँ
फ़ाइदा
है
कम-ज़बानी
में
उड़ाई
मौज
हमने
आसमानों
पर
खिलाए
गुल
कई
हमने
जवानी
में
तिरे
जैसा
न
कोई
हम
सेफ़र
हो
तो
सफ़र
ये
ख़त्म
होगा
राइगानी
में
किसी
से
भी
नहीं
जब
बात
बन
पाई
बिता
दी
उम्र
हमने
ख़ुद-ग़ुमानी
में
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Dileep Kumar
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बन
जाते
हैं
जुगनू
अपने
दोस्त
सभी
हैं
दिल-जू
अपने
कोई
भी
साथ
नहीं
हो
तब
बहने
देना
आँसू
अपने
हो
जाते
हैं
बे-क़ाबू
हम
खोलो
ना
यूँँ
गेसू
अपने
मरना
मुश्किल
है
लेकिन
ये
ज़ीस्त
कहाँ
है
क़ाबू
अपने
उसको
भाते
पर
सीरत
से
आती
है
अब
बदबू
अपने
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Dileep Kumar
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ये
ज़माना
भी
इसी
बा'इस
तिरा
है
झूठ
भी
सच
की
तरह
तू
बोलता
है
Dileep Kumar
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हम
लोग
हाल-ए-ज़ार
के
मारे
हुए
छत
पर
खड़े
हैं
अब
थके-हारे
हुए
Dileep Kumar
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