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Dileep Kumar
ghazal ke qaafiye badle ghazal badli
ghazal ke qaafiye badle ghazal badli | ग़ज़ल के क़ाफ़िए बदले, ग़ज़ल बदली
- Dileep Kumar
ग़ज़ल
के
क़ाफ़िए
बदले,
ग़ज़ल
बदली
ग़ज़ल
के
फिर
म'आनी
भी
नए
रक्खे
- Dileep Kumar
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उसका
जिस
से
भी
मतलब
निकल
पड़ता
है
दफ़'अतन
उसकी
जानिब
वो
चल
पड़ता
है
मेरी
बातों
के
मा'नी
भी
तो
समझा
कर
ऐसे
हर
बात
पे
क्या
उछल
पड़ता
है
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दिन
भर
थकान
और
बस
दिल
में
गुमान
और
बस
क़ाज़ी
के
हाथ
कुछ
नहीं
कोई
बयान
और
बस
करने
को
और
कुछ
नहीं
उसका
बखान
और
बस
सब
कुछ
उसी
पे
मुनहसिर
वो
मेहरबान
और
बस
ये
आसमान
तेरा
है
भर
ले
उड़ान
और
बस
अपने
दुखों
पे
रोते
हैं
हम
ये
मकान
और
बस
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दरमियाँ
जब
किसी
को
गवारा
किया
हमने
हर
एक
से
फिर
किनारा
किया
हमने
तो
सोची
थी
ज़िंदगी
साथ
में
पर
किसी
और
से
ही
गुज़ारा
किया
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Dileep Kumar
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हिज्र
में
जो
सहारा
हुआ
फिर
उसी
से
किनारा
हुआ
आ
न
पाए
तिरे
शहर
तो
पर
वहीं
पे
गुज़ारा
हुआ
जब
किसी
की
नज़र
थी
नहीं
तब
जरा
सा
इशारा
हुआ
हैं
हज़ारों
दिवाने
तिरे
और
तू
कब
हमारा
हुआ
अब
किसी
की
ज़रूरत
नहीं
देख
कितना
ख़सारा
हुआ
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इश्क़
में
जीत
की
हवस
का
है
खेल
सारा
ये
दस्तरस
का
है
मय-कशी
रास
आएगी
न
हमें
ये
मज़ा
है
जो
यक-नफ़स
का
है
ठीक
से
अब
मुझे
समझ
आया
एक
दुख
जो
कई
बरस
का
है
उनकी
हम
बात
कर
नहीं
सकते
शहर
में
सब
उन्हीं
के
बस
का
है
फिर
से
दोनों
में
हो
गया
झगड़ा
फिर
से
ये
झगड़ा
हम-नफ़स
का
है
उड़ने
को
आसमाँ
नहीं
मिलता
इन
परिंदों
को
ग़म
क़फ़स
का
है
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