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Dileep Kumar
uskaa jis se bhi matlab nikal padta hai
uskaa jis se bhi matlab nikal padta hai | उसका जिस से भी मतलब निकल पड़ता है
- Dileep Kumar
उसका
जिस
से
भी
मतलब
निकल
पड़ता
है
दफ़'अतन
उसकी
जानिब
वो
चल
पड़ता
है
मेरी
बातों
के
मा'नी
भी
तो
समझा
कर
ऐसे
हर
बात
पे
क्या
उछल
पड़ता
है
- Dileep Kumar
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हमको
तो
प्यार
चाहिए
था
तेरा
प्यार
सिर्फ़
इस
बात
से
वफ़ा
का
कोई
वास्ता
नहीं
Vikas Rajput
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बात
करते
हुए
बे-ख़याली
में
ज़ुल्फ़ें
खुली
छोड़
दी
हम
निहत्थों
पे
उसने
ये
कैसी
बलाएँ
खुली
छोड़
दी
साथ
जब
तक
रहे
एक
लम्हे
को
भी
रब्त
टूटा
नहीं
उसने
आँखें
अगर
बंद
कर
ली
तो
बाँहें
खुले
छोड़
दी
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Khurram Afaq
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तमाम
बातें
जो
चाहता
था
मैं
तुम
सेे
कहना
वो
एक
काग़ज़
पे
लिख
के
काग़ज़
जला
दिया
है
Dipendra Singh 'Raaz'
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रंग
की
अपनी
बात
है
वर्ना
आख़िरश
ख़ून
भी
तो
पानी
है
Jaun Elia
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ख़ुश्बू
की
बरसात
नहीं
कर
पाते
हैं
हम
ख़ुद
ही
शुरुआत
नहीं
कर
पाते
हैं
जिस
लड़की
की
बातें
करते
हैं
सब
सेे
उस
लड़की
से
बात
नहीं
कर
पाते
हैं
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Gyan Prakash Akul
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सोच
समझ
कर
देख
लिया
है
क्या
बोलूँ
तुझ
को
तो
हर
बात
बुरी
लग
जाती
है
Sohil Barelvi
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हम
हार
गए
तुम
जीत
गए
हम
ने
खोया
तुम
ने
पाया
इन
छोटी
छोटी
बातों
का
हम
कोई
ख़याल
नहीं
करते
Wali Aasi
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है
कुछ
ऐसी
ही
बात
जो
चुप
हूँ
वर्ना
क्या
बात
कर
नहीं
आती
Mirza Ghalib
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जहान
भर
में
न
हो
मुयस्सर
जो
कोई
शाना,
हमें
बताना
नहीं
मिले
गर
कोई
ठिकाना
तो
लौट
आना,
हमें
बताना
कुछ
ऐसी
बातें
जो
अनकही
हों,
मगर
वो
अंदर
से
खा
रही
हों
लगे
किसी
को
बताना
है
पर
नहीं
बताना,
हमें
बताना
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Vikram Gaur Vairagi
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वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आ
कर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
Zubair Ali Tabish
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रात
जितनी
जगमगाती
रहती
है
उतना
ही
ये
दिल
दुखाती
रहती
है
वैसे
तो
मुझ
को
नहीं
कोई
कमी
तेरी
लेकिन
याद
आती
रहती
है
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Dileep Kumar
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दूर
साए
से
मेरे
कहीं
रहती
हो
या'नी
इस
शहर
में
अब
नहीं
रहती
हो
लौट
आया
हूँ
इक
दोस्त
के
घर
से
मैं
जब
ये
देखा
कि
तुम
भी
वहीं
रहती
हो
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Dileep Kumar
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ज़िंदगी
दुश्वार
है
आसान
क्या
है
मौत
से
जब
लड़
लिए
तूफ़ान
क्या
है
देश
को
जुमले
पे
जुमला
देने
वाले
इस
चुनाव
में
नया
ऐलान
क्या
है
हिंदू-मुस्लिम
करते
रहते
हैं
ये
दिन
भर
और
इनके
पास
में
सामान
क्या
है
हम
से
सच्चे
लोग
सच
बोला
करेंगे
हम
से
लोगों
के
लिए
ज़िंदान
क्या
है
राब्ता
रखने
लगा
है
मुझ
सेे
'मसरूर'
जानता
है
रब्त
का
नुक़सान
क्या
है
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Dileep Kumar
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ग़ुरूर
भी
बहुत
हैं
और
दिलकशी
नहीं
रही
तिरे
बिना
ये
ज़िंदगी
भी
ज़िंदगी
नहीं
रही
मिलें
हैं
आज
तीन-चार
साल
बाद
हम
कहीं
मगर
लबों
पे
उस
के
वो
शिकस्तगी
नहीं
रही
सभी
ही
तोड़ते
रहे
किसी
तरह
से
दिल
मिरा
मगर
मिरी
किसी
से
बे-त'अल्लुक़ी
नहीं
रही
ये
एक
शख़्स
का
मलाल
सीख
दे
गया
मुझे
जहाँ
में
अब
'दिलीप'
आदमी-गरी
नहीं
रही
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Dileep Kumar
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बन
जाते
हैं
जुगनू
अपने
दोस्त
सभी
हैं
दिल-जू
अपने
कोई
भी
साथ
नहीं
हो
तब
बहने
देना
आँसू
अपने
हो
जाते
हैं
बे-क़ाबू
हम
खोलो
ना
यूँँ
गेसू
अपने
मरना
मुश्किल
है
लेकिन
ये
ज़ीस्त
कहाँ
है
क़ाबू
अपने
उसको
भाते
पर
सीरत
से
आती
है
अब
बदबू
अपने
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Dileep Kumar
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