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Dharamraj deshraj
samay haathon se niklaa ja raha hai
samay haathon se niklaa ja raha hai | समय हाथों से निकला जा रहा है
- Dharamraj deshraj
समय
हाथों
से
निकला
जा
रहा
है
परिंदा
वक़्त
का
समझा
रहा
है
मुसाफ़िर
की
तरह
हम
सब
यहाँ
हैं
कोई
आया
तो
कोई
जा
रहा
है
अभी
भी
वक़्त
है
यारो
सँभलिए
समय
अब
आईना
दिखला
रहा
है
जहाँ
इंसान
भी
गायब
मिलेगा
अभी
बस
वो
ज़माना
आ
रहा
है
जरा
सोचो
कि
ईमाँ
जब
न
होगा
अभी
तो
आदमी
इतरा
रहा
है
सलीक़े
से
हमें
रहना
ही
होगा
भले
मौसम
हमें
भटका
रहा
है
'धरम'
अब
तो
बुराई
छोड़
भी
दे
जो
दानिशमंद
है
समझा
रहा
है
- Dharamraj deshraj
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मैं
कुछ
दिन
से
अचानक
फिर
अकेला
पड़
गया
हूँ
नए
मौसम
में
इक
वहशत
पुरानी
काटती
है
Liaqat Jafri
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एक
दरिया
है
यहाँ
पर
दूर
तक
फैला
हुआ
आज
अपने
बाजुओं
को
देख
पतवारें
न
देख
Dushyant Kumar
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हमारा
काम
तो
मौसम
का
ध्यान
करना
है
और
उस
के
बाद
के
सब
काम
शश-जहात
के
हैं
Pallav Mishra
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इशरत-ए-क़तरा
है
दरिया
में
फ़ना
हो
जाना
दर्द
का
हद
से
गुज़रना
है
दवा
हो
जाना
Mirza Ghalib
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करती
है
तो
करने
दे
हवाओं
को
शरारत
मौसम
का
तकाज़ा
है
कि
बालों
को
खुला
छोड़
Abrar Kashif
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मैं
सालों
बाद
जब
भी
गाँव
जाता
हूँ
लिए
पीपल
की
ठंडी
छाँव
जाता
हूँ
कहीं
मैली
न
हो
जाए
ये
जन्नत
मैं
माँ
के
पास
नंगे
पाँव
जाता
हूँ
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Ashok Sagar
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धूप
के
एक
ही
मौसम
ने
जिन्हें
तोड़
दिया
इतने
नाज़ुक
भी
ये
रिश्ते
न
बनाये
होते
Waseem Barelvi
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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हमें
इस
मिट्टी
से
कुछ
यूँँ
मुहब्बत
है
यहीं
पे
निकले
दम
दिल
की
ये
हसरत
है
हमें
क्यूँ
चाह
उस
दुनिया
की
हो
मौला
हमारी
तो
इसी
मिट्टी
में
जन्नत
है
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Harsh saxena
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बदल
गए
मेरे
मौसम
तो
यार
अब
आए
ग़मों
ने
चाट
लिया
ग़म-गुसार
अब
आए
Farhat Abbas Shah
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तुझको
पाकर
मैं
खो
नहीं
सकता
जन्म
भर
ऐसा
हो
नहीं
सकता
मेरी
गै़रत
ने
रोक
रक्खा
है
ख़ुद
को
ग़म
में
डुबो
नहीं
सकता
बेवफ़ाई
का
दाग़
मत
देना
आँसुओ
से
भी
धो
नहीं
सकता
वा'दा
हँसने
का
कर
चुका
आख़िर
चाह
कर
भी
मैं
रो
नहीं
सकता
है
क़लम
हल,
ज़मीन
काग़ज़
की
अपने
आँसू
भी
बो
नहीं
सकता
अश्क़
मोती
हैं
मत
करो
ज़ाया'
ऐसे
मोती
पिरो
नहीं
सकता
मौत
कब
वस्ल
को
'धरम'
आए
बेख़बर
होके
सो
नहीं
सकता
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Dharamraj deshraj
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बनेगी
आँसुओं
से
बात
थोड़ी
बदल
जाएँगे
यूँँ
हालात
थोड़ी
किसी
के
आँसुओं
पे
मुस्कुराना
अरे
नादाँ
है
अच्छी
बात
थोड़ी
चलो
इक
दूसरे
के
बाँट
लें
ग़म
कटेगी
कश्मकश
में
रात
थोड़ी
भलाई
करके
ही
आँसू
कमाये
ज़माने
से
मिली
सौग़ात
थोड़ी
हुआ
होगा
यक़ीनन
कुछ
न
कुछ
तो
बड़ी
तकरार
है
बिन
बात
थोड़ी
ख़ज़ाना
दर्द
का
मुझको
मिला
है
कमाई
है
मेरी
खैरात
थोड़ी
ग़ज़ल
में
दर्द-ओ-ग़म
आँसू
मेरे
हैं
हक़ीक़त
है
धरम
ज़ज़्बात
थोड़ी
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Dharamraj deshraj
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आह
जब
आसमान
तक
पहुँची
रौशनी
तब
मकान
तक
पहुँची
ज़ब्त
कब
तक
तेरे
सितम
करता
अब
शिकायत
बयान
तक
पहुँची
बढ़
गया
दर्द
या
हुआ
ऐसा
ज़िन्दगी
इम्तिहान
तक
पहुँची
दर्द
के
साथ
में
मुहब्बत
थी
शा'इरी
हर
ज़बान
तक
पहुँची
आ
रहा
इंक़िलाब
दुनिया
में
शुक्र
है
बात
कान
तक
पहुँची
आँख
से
ख़ूँ
बहा
है
तब
जाकर
शा'इरी
आसमान
तक
पहुँची
दर्द
जब
जब
'धरम'
ने
पाया
है
बेज़ुबानी
ज़बान
तक
पहुँची
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Dharamraj deshraj
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जब
तक
कि
आदमी
को
सुकूँ
की
तलाश
है
सौ
इंक़िलाब
आएँगे
इक
इंक़िलाब
क्या
Dharamraj deshraj
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बे-वफ़ा
ज़ीस्त
बुलबुला
निकली
कट
गई
उम्र
आँख
मलते
ही
Dharamraj deshraj
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