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Dharamraj deshraj
aah jab aasmaan tak pahunchee
aah jab aasmaan tak pahunchee | आह जब आसमान तक पहुँची
- Dharamraj deshraj
आह
जब
आसमान
तक
पहुँची
रौशनी
तब
मकान
तक
पहुँची
ज़ब्त
कब
तक
तेरे
सितम
करता
अब
शिकायत
बयान
तक
पहुँची
बढ़
गया
दर्द
या
हुआ
ऐसा
ज़िन्दगी
इम्तिहान
तक
पहुँची
दर्द
के
साथ
में
मुहब्बत
थी
शा'इरी
हर
ज़बान
तक
पहुँची
आ
रहा
इंक़िलाब
दुनिया
में
शुक्र
है
बात
कान
तक
पहुँची
आँख
से
ख़ूँ
बहा
है
तब
जाकर
शा'इरी
आसमान
तक
पहुँची
दर्द
जब
जब
'धरम'
ने
पाया
है
बेज़ुबानी
ज़बान
तक
पहुँची
- Dharamraj deshraj
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इस
ज़माने
में
भी
इक
लड़का
तुम्हें
यूँँ
चाहता
है
अपने
रब
से
वो
तुम्हारी
जैसी
बेटी
माँगता
है
तुम
भला
उस
प्रेम
की
गहराई
क्या
समझोगे
जानाँ
जो
कभी
ख़्वाबों
में
भी
अपनी
न
सरहद
लाँघता
है
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Harsh saxena
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तू
मुझे
छोड़
के
ठुकरा
के
भी
जा
सकती
है
तेरे
हाथों
में
मेरे
हाथ
हैं
ज़ंजीर
नहीं
Sahir Ludhianvi
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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बाज़
बनना
है
तो
फिर
कद
भूल
जा
आँख
में
रख
लक्ष्य
और
हद
भूल
जा
किसलिए
डरता
है
दीवारों
से
तू
आ
समाँँ
को
देख
सरहद
भूल
जा
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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उस
मुल्क
की
सरहद
को
कोई
छू
नहीं
सकता
जिस
मुल्क
की
सरहद
की
निगहबान
हैं
आँखें
Unknown
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माँ
बाप
और
उस्ताद
सब
हैं
ख़ुदा
की
रहमत
है
रोक-टोक
उन
की
हक़
में
तुम्हारे
नेमत
Altaf Hussain Hali
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तुम
भला
उस
प्रेम
की
गहराई
क्या
समझोगे
जानाँ
जो
कभी
ख़्वाबों
में
भी
अपनी
न
सरहद
लाँघता
है
Harsh saxena
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न
जाने
ख़त्म
हुई
कब
हमारी
आज़ादी
तअल्लुक़ात
की
पाबंदियाँ
निभाते
हुए
Azhar Iqbal
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देख
ज़िंदाँ
से
परे
रंग-ए-चमन
जोश-ए-बहार
रक़्स
करना
है
तो
फिर
पाँव
की
ज़ंजीर
न
देख
Majrooh Sultanpuri
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निगाह-ए-गर्म
क्रिसमस
में
भी
रही
हम
पर
हमारे
हक़
में
दिसम्बर
भी
माह-ए-जून
हुआ
Akbar Allahabadi
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ज़ख़्म
दे
दीजिए
नया
दिल
को
पर
न
कहिए
भला-बुरा
दिल
को
वक़्ते-रुख़्सत
वो
आँख
में
आँसू
उसने
दी
सख़्त
ये
सज़ा
दिल
को
ये
तड़पता
है
दीद
पाने
को
कितना
सबने
किया
मना
दिल
को
जाते-जाते
कहा
कि
ख़ुश
रहिए
मार
डाले
न
ये
दु'आ
दिल
को
दिल
मचलता
है
कसमसाता
है
कौन
देकर
गया
सज़ा
दिल
को
आँख
में
दर्द
और
लब
पे
हँसी
भा
गई
उनकी
ये
अदा
दिल
को
ज़ीस्त
में
दिन
न
वो
कभी
आए
कोई
रोए
मिले
मज़ा
दिल
को
बेकरारी
में
उम्र
गुज़री
'धरम'
चैन
आख़िर
नहीं
मिला
दिल
को
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Dharamraj deshraj
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जो
मुमकिन
हो
तो
सीने
में
बसा
लो
ये
दिल
भी
आशियाना
चाहता
है
Dharamraj deshraj
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आँखों
में
अश्क
भर
के
कहो
यूँँ
न
अलविदा
एहसान
आँसुओं
का
उठाया
न
जाएगा
Dharamraj deshraj
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चमन
में
भी
कली
घबरा
रही
है
क़यामत
अब
यक़ीनन
आ
रही
है
कमी
होती
नहीं
है
दर्द-ओ-ग़म
में
ये
दौलत
रोज़
बढ़ती
जा
रही
है
सिवा
ख़्वाबों
के
देखा
ही
नहीं
था
तुम्हारी
आँख
धोखा
खा
रही
है
उन्हें
दिल
से
गए
मुद्द्त
हुई
हैं
अभी
तक
उनकी
ख़ुशबू
आ
रही
है
चलो
तक़दीर
अपनी
ख़ुद
लिखें
हम
भले
ये
ज़िन्दगी
भटका
रही
है
किसी
की
आह
निकली
कहकहों
में
किसी
को
तो
ग़ज़ल
ये
भा
रही
है
जवानी
में
धरम
भूले
क़ज़ा
को
अभी
तो
ज़िन्दगी
इतरा
रही
है
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उम्र
लंबी
जिओ
बुरा
क्या
है
ये
दु'आ
है
तो
बद्दुआ
क्या
है
ख़त
में
रखकर
जो
अश्क
भेजे
हैं
कोई
कह
दे
उन्हें
हुआ
क्या
है
ख़्वाब
में
भी
तो
अब
नहीं
मिलते
मेरे
जैसा
कोई
मिला
क्या
है
दिल
जो
कहता
है
मैं
वही
करता
क्या
मैं
जानू
भला
-बुरा
क्या
है
मौत
रुक
तुझको
ज़िन्दगी
दे
दूँ
ज़िन्दगी
तेरा
फ़ैसला
क्या
है
क्या
नहीं
इस
जहान
से
पाया
सोचिये
आपने
दिया
क्या
है
प्यार
मज़लूम
से
'धरम'
ने
किया
इस
ख़ता
की
भला
सज़ा
क्या
है
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