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Ajeetendra Aazi Tamaam
baaz banna hai to fir kad bhool ja
baaz banna hai to fir kad bhool ja | बाज़ बनना है तो फिर कद भूल जा
- Ajeetendra Aazi Tamaam
बाज़
बनना
है
तो
फिर
कद
भूल
जा
आँख
में
रख
लक्ष्य
और
हद
भूल
जा
किसलिए
डरता
है
दीवारों
से
तू
आ
समाँँ
को
देख
सरहद
भूल
जा
- Ajeetendra Aazi Tamaam
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किसी
को
याद
रख
के
भूल
जाना
किसी
का
भूल
जाना
याद
रहना
Rachit Dixit
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हमने
सब
सीखा
था
उसके
ख़ातिर
बस
भूल
उसे
ख़ुद
जीना
सीख
नहीं
पाए
Surya Tiwari
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मैं
कहता
हूँ
"सुनो
लड़की!
मुझे
कुछ
तुम
से
कहना
था"
वो
ऐसे
पूछती
है
फिर
मैं
सब
कुछ
भूल
जाता
हूँ
Shadab Asghar
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ऐ
शौक़-ए-नज़ारा
क्या
कहिए
नज़रों
में
कोई
सूरत
ही
नहीं
ऐ
ज़ौक़-ए-तसव्वुर
क्या
कीजे
हम
सूरत-ए-जानाँ
भूल
गए
Asrar Ul Haq Majaz
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इस
ज़िन्दगी
में
इतनी
फ़राग़त
किसे
नसीब
इतना
न
याद
आ
कि
तुझे
भूल
जाएँ
हम
Ahmad Faraz
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हमें
भी
आज
ही
करना
था
इंतिज़ार
उस
का
उसे
भी
आज
ही
सब
वादे
भूल
जाने
थे
Aashufta Changezi
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सारे
ग़म
भूल
गए
आपके
रोने
पे
मुझे
किसको
ठंडक
में
पसीने
का
ख़्याल
आता
है
आखरी
उम्र
में
जाते
है
मदीने
हम
लोग
मरने
लगते
है
तो
जीने
का
ख़याल
आता
है
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Nadir Ariz
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अब
तो
हर
बात
याद
रहती
है
ग़ालिबन
मैं
किसी
को
भूल
गया
Jaun Elia
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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सुब्ह
तक
वज्ह-ए-जाँ-कनी
थी
जो
बात
मैं
उसे
शाम
ही
को
भूल
गया
Jaun Elia
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भले
हों
ख़ून
के
रिश्ते
या
दुनिया
के
फ़रिश्ते
हों
ग़म-ए-ग़ुर्बत
के
मारों
को
सहारा
कौन
देता
है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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ज़िंदगी
से
जंग
चाहे
ज़िंदगी
भर
ही
चले
जीते
जी
तो
मेरी
जाँ
अब
हार
मानेंगे
नहीं
मुस्कुरा
कर
ही
सहेंगे
चाहे
जितना
दर्द
हो
मुस्कुराने
से
कदाचित्
रार
ठानेंगे
नहीं
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Ajeetendra Aazi Tamaam
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कि
मर
जाएँ
हम
ये
दु'आ
गर
करो
दु'आ
हो
क़ुबूल
आपकी
साहिबा
Ajeetendra Aazi Tamaam
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ये
कभी
भी
दग़ा
नहीं
करतीं
चल
किताबों
से
इश्क़
करते
हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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कंजूसी
को
ताक़
पे
रखना
होता
है
गुड़
कहने
से
कब
मुँह
मीठा
होता
है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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