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Dharamraj deshraj
jab tak ki aadmi ko sukoon ki talash hai
jab tak ki aadmi ko sukoon ki talash hai | जब तक कि आदमी को सुकूँ की तलाश है
- Dharamraj deshraj
जब
तक
कि
आदमी
को
सुकूँ
की
तलाश
है
सौ
इंक़िलाब
आएँगे
इक
इंक़िलाब
क्या
- Dharamraj deshraj
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उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी
से
अंजुम
सह
में
जाते
हैं
कि
ये
टूटा
हुआ
तारा
मह-ए-कामिल
न
बन
जाए
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Allama Iqbal
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लोगों
ने
बहुत
चाहा
अपना
सा
बना
डालें
पर
हम
ने
कि
अपने
को
इंसान
बहुत
रक्खा
Abdul Hameed
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इत्तिफ़ाक़
अपनी
जगह
ख़ुश-क़िस्मती
अपनी
जगह
ख़ुद
बनाता
है
जहाँ
में
आदमी
अपनी
जगह
Anwar Shaoor
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अब
जो
पत्थर
है
आदमी
था
कभी
इस
को
कहते
हैं
इंतिज़ार
मियाँ
Afzal Khan
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देवताओं
का
ख़ुदास
होगा
काम
आदमी
को
आदमी
दरकार
है
Firaq Gorakhpuri
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देखें
क़रीब
से
भी
तो
अच्छा
दिखाई
दे
इक
आदमी
तो
शहर
में
ऐसा
दिखाई
दे
Zafar Gorakhpuri
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मिरे
किरदार
जाने
दे
नज़रअंदाज
कर
दे
ख़ुदा
की
फ़िल्म
है
ये
आदमी
से
क्या
शिकायत
Vikram Sharma
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ख़ूब-सूरत
है
सिर्फ़
बाहरस
ये
इमारत
भी
आदमी
सी
है
Azhar Nawaz
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मत
सहल
हमें
जानो
फिरता
है
फ़लक
बरसों
तब
ख़ाक
के
पर्दे
से
इंसान
निकलते
हैं
Meer Taqi Meer
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मन
के
हारे
हुए
इंसान
को
हुस्न-ए-शय
से
कोई
मतलब
नहीं
कोई
भी
सरोकार
नहीं
shaan manral
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जिसको
रब
का
पता
नहीं
मिलता
उसको
ग़म
में
मज़ा
नहीं
मिलता
देवता
तो
बहुत
यहाँ
मिलते
आदमी
का
पता
नहीं
मिलता
अपने
रब
की
तलाश
में
गुम
हैं
वो
हमें
क्यूँँ
भला
नहीं
मिलता
जो
न
पागल
हुए
मुहब्बत
में
सिर्फ़
उसको
ख़ुदा
नहीं
मिलता
मौत
ही
तो
यहाँ
यक़ीनी
है
ज़िन्दगी
का
पता
नहीं
मिलता
लुत्फ़
आता
जिसे
रुलाने
में
बस
वही
ग़मज़दा
नहीं
मिलता
हाल-ए-दिल
जिस
में
'धर्म'
कह
देते
सिर्फ़
वो
क़ाफ़िया
नहीं
मिलता
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Dharamraj deshraj
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कभी
भूलकर
भी
न
मुफ़लिस
बताना
मिला
है
हमें
आँसुओं
का
ख़ज़ाना
Dharamraj deshraj
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तुझको
पाकर
मैं
खो
नहीं
सकता
जन्म
भर
ऐसा
हो
नहीं
सकता
मेरी
गै़रत
ने
रोक
रक्खा
है
ख़ुद
को
ग़म
में
डुबो
नहीं
सकता
बेवफ़ाई
का
दाग़
मत
देना
आँसुओ
से
भी
धो
नहीं
सकता
वा'दा
हँसने
का
कर
चुका
आख़िर
चाह
कर
भी
मैं
रो
नहीं
सकता
है
क़लम
हल,
ज़मीन
काग़ज़
की
अपने
आँसू
भी
बो
नहीं
सकता
अश्क़
मोती
हैं
मत
करो
ज़ाया'
ऐसे
मोती
पिरो
नहीं
सकता
मौत
कब
वस्ल
को
'धरम'
आए
बेख़बर
होके
सो
नहीं
सकता
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Dharamraj deshraj
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आप
थोड़ा
जो
मुस्कुरा
देते
दर्दो-ग़म
हम
सभी
भुला
देते
उम्र
भर
बस
उन्हें
दु'आ
देते
मुझको
मुझ
सेे
अगर
मिला
देते
यार
होते
अगर
जो
तुम
मेरे
मुस्कुराने
का
मशवरा
देते
जाने
होते
फ़ना
यहॉं
कितने
रुख़
से
पर्दा
ज़रा
हटा
देते
कितने
नादान
हैं
जहाँ
वाले
आदमी
को
ख़ुदा
बना
देते
सिर्फ़
मंज़िल
का
ज़िक्र
भर
करते
अपनी
नाकामियाँ
भुला
देते
यार
तुमको
'धरम'
समझ
लेता
सो
रहा
था
अगर
जगा
देते
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Dharamraj deshraj
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दिल
के
ज़ख़्मों
की
निशानी
और
है
ख़ून
सा
आँखों
में
पानी
और
है
जान
देते
थे
फ़क़त
इक
बात
पर
वो
जवानी
ये
जवानी
और
है
कर
लिया
वा'दा
तो
फिर
सोचा
नहीं
बात
मेरी
ख़ानदानी
और
है
फ़ैसले
उसके
सदा
होते
सही
मेरे
रब
की
हुक्मरानी
और
है
भूख,
दौलत
या
के
शौहरत
की
नहीं
शे'र
का
मेरे
मआनी
और
है
प्यार
है
लालो-गुहरस
आपको
हाँ
मगर
मेरी
कहानी
और
है
दिख
रहा
जैसा
नहीं
वैसा
'धरम'
इस
हक़ीक़त
में
कहानी
और
है
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Dharamraj deshraj
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