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Dharamraj deshraj
jisko rab ka pata nahin milta
jisko rab ka pata nahin milta | जिसको रब का पता नहीं मिलता
- Dharamraj deshraj
जिसको
रब
का
पता
नहीं
मिलता
उसको
ग़म
में
मज़ा
नहीं
मिलता
देवता
तो
बहुत
यहाँ
मिलते
आदमी
का
पता
नहीं
मिलता
अपने
रब
की
तलाश
में
गुम
हैं
वो
हमें
क्यूँँ
भला
नहीं
मिलता
जो
न
पागल
हुए
मुहब्बत
में
सिर्फ़
उसको
ख़ुदा
नहीं
मिलता
मौत
ही
तो
यहाँ
यक़ीनी
है
ज़िन्दगी
का
पता
नहीं
मिलता
लुत्फ़
आता
जिसे
रुलाने
में
बस
वही
ग़मज़दा
नहीं
मिलता
हाल-ए-दिल
जिस
में
'धर्म'
कह
देते
सिर्फ़
वो
क़ाफ़िया
नहीं
मिलता
- Dharamraj deshraj
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ग़मज़दा
हूँ
ज़रा
दवा
भेजो
वर्ना
यारब
मुझे
बुला
भेजो
की
दु'आ
माँ
से
उस
जहाँ
से
मुझे
अपने
जैसा
कोई
ख़ुदा
भेजो
ख़त
लिखा
और
इल्तिज़ा
ये
की
दर्द
भेजो
तो
अलहदा
भेजो
फिर
नए
सब्ज़ो-बाग़
ही
लिखकर
मुझको
जीने
का
आसरा
भेजो
सुर्ख़
मौसम
जला
न
दे
यारब
फूल
,
ख़ुश्बू
नई
हवा
भेजो
ख़त
लबों
से
ज़रा-
ज़रा
छूकर
एक
लम्हा
ही
ख़ुशनुमा
भेजो
ऐब
मेरे
'धरम'
नज़र
आएँ
मुझको
ऐसा
इक
आईना
भेजो
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उम्र
लंबी
जिओ
बुरा
क्या
है
ये
दु'आ
है
तो
बद्दुआ
क्या
है
ख़त
में
रखकर
जो
अश्क
भेजे
हैं
कोई
कह
दे
उन्हें
हुआ
क्या
है
ख़्वाब
में
भी
तो
अब
नहीं
मिलते
मेरे
जैसा
कोई
मिला
क्या
है
दिल
जो
कहता
है
मैं
वही
करता
क्या
मैं
जानू
भला
-बुरा
क्या
है
मौत
रुक
तुझको
ज़िन्दगी
दे
दूँ
ज़िन्दगी
तेरा
फ़ैसला
क्या
है
क्या
नहीं
इस
जहान
से
पाया
सोचिये
आपने
दिया
क्या
है
प्यार
मज़लूम
से
'धरम'
ने
किया
इस
ख़ता
की
भला
सज़ा
क्या
है
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तू
नहीं
ग़म
भी
तेरा
प्यारा
है
सिर्फ़
कह
दे
कि
तू
हमारा
है
मौत
का
भी
नहीं
रहा
है
डर
दर्दोग़म
ने
हमें
निख़ारा
है
आपसे
इश्क़
हो
गया
शायद
आपका
हर
सितम
गवारा
है
ज़ीस्त
का
क्या
हिसाब
दूँ
यारों
वक़्त
गुज़रा
नहीं
गुज़ारा
है
ज़ख़्म
पाकर
भी
ख़ुश
हुआ
यारो
ज़ख़्म
ने
ज़िस्म
को
निखारा
है
मुझको
ग़म
में
सिखा
दिया
रोना
यार
एहसान
सब
तुम्हारा
है
हुक्म
पाते
ही
चल
दिया
इन्साँ
आसमानों
ने
जब
पुकारा
है
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मुसीबत
है
बला
है
और
मैं
हूँ
ग़मों
से
सामना
है
और
मैं
हूँ
परेशाँ
इश्क़
करके
हो
गया
दिल
जहाँ
दुश्मन
हुआ
है
और
मैं
हूँ
मुहब्बत
की
सज़ा
है
क़त्ल
करदो
तुम्हारा
फ़ैसला
है
और
मैं
हूँ
वो
पत्थर
नफ़रतों
के
साथ
लाया
लबों
पर
बद्दुआ
है
और
मैं
हूँ
ज़माना
कितने
ही
तूफ़ाँ
उठाले
मेरे
सँग
में
ख़ुदा
है
और
मैं
हूँ।
मुझे
मालूम
है
मंज़िल
किधर
है
तिरे
घर
का
पता
है
और
मैं
हूँ
ख़रीदेगा
'धरम'
को
वो
भला
क्या
वो
नफ़रत
से
भरा
है
और
मैं
हूँ
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यूँँ
भी
किया
गया
है
मिरे
दर्द
का
इलाज़
काँटे
चुभा-चुभाके
तलाशा
है
दर्द
को
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