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Dharamraj deshraj
dosti ki abhii abhii unse
dosti ki abhii abhii unse | दोस्ती की अभी अभी उन सेे
- Dharamraj deshraj
दोस्ती
की
अभी
अभी
उन
सेे
ज़ख़्म
हमको
अभी
से
मिलते
हैं
- Dharamraj deshraj
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एक
ही
नदी
के
हैं
ये
दो
किनारे
दोस्तो
दोस्ताना
ज़िंदगी
से
मौत
से
यारी
रखो
Rahat Indori
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इश्क़
में
पागल
हो
जाना
भी
फ़न
है
दोस्त
और
ये
दुख
की
बात
है
हम
फ़नकार
नहीं
Praveen Sharma SHAJAR
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ग़ज़ल
की
चूड़ियाँ
लेकर
जहाँ
तुम
जा
रहे
हो
दोस्त
वहाँ
हर
शख़्स
के
हाथों
में
बस
सोने
के
कंगन
हैं
Saarthi Baidyanath
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एक
आवाज़
कि
जो
मुझको
बचा
लेती
है
ज़िन्दगी
आख़री
लम्हों
में
मना
लेती
है
जिस
पे
मरती
हो
उसे
मुड़
के
नहीं
देखती
वो
और
जिसे
मारना
हो
यार
बना
लेती
है
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Ali Zaryoun
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बहुत
चल
बसे
यार
ऐ
ज़िंदगी
कोई
दिन
की
मेहमान
तू
रह
गई
Dagh Dehlvi
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अब
वो
तितली
है
न
वो
उम्र
तआ'क़ुब
वाली
मैं
न
कहता
था
बहुत
दूर
न
जाना
मिरे
दोस्त
Faisal Ajmi
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यार
भी
राह
की
दीवार
समझते
हैं
मुझे
मैं
समझता
था
मेरे
यार
समझते
हैं
मुझे
Shahid Zaki
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बस
एक
ही
दोस्त
है
दुनिया
में
अपना
मगर
उस
से
भी
झगड़ा
चल
रहा
है
Zubair Ali Tabish
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यार
सब
जम्अ'
हुए
रात
की
ख़ामोशी
में
कोई
रो
कर
तो
कोई
बाल
बना
कर
आया
Ahmad Mushtaq
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यार
तस्वीर
में
तन्हा
हूँ
मगर
लोग
मिले
कई
तस्वीर
से
पहले
कई
तस्वीर
के
बा'द
Umair Najmi
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ज़ख़्म
कुछ-कुछ
भर
चले
या
यूँँ
कहो
ज़िन्दगी
फिर
से
शुरू
होने
लगी
Dharamraj deshraj
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आ
भी
जाओ
ख़ुदारा
नये
साल
में
दिल
ने
तुमको
पुकारा
नये
साल
में
फिर
नये
ग़म
मिलेंगे
पता
है
हमें
वक़्त
का
है
इशारा
नये
साल
में
इल्तिज़ा
है
यही
यार
मिलकर
रहें
ग़म
न
देना
दुबारा
नये
साल
में
ज़ख़्म
पिछले
बरस
के
हरे
हैं
अभी
हौसला
हमने
हारा
नये
साल
में
भीख
में
उन
सेे
कोई
ख़ुशी
माँग
लूँ
ये
नहीं
है
ग़वारा
नये
साल
में
राहबर
ने
सताया
बहुत
रहज़नों
अब
तुम्हारा
सहारा
नये
साल
में
ज़ीस्त
की
उलझनों
को
भुलाकर
धरम
मुस्कुराओ
ख़ुदारा
नये
साल
में
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Dharamraj deshraj
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ऐ
चाँद
बादलों
से
निकल
आ
तो
सामने
लेंगे
हज़ार
मर्तबा
बोसे
नज़र
से
हम
Dharamraj deshraj
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क्या
बात
हो
गई
है
जो
शरमा
रहे
हो
तुम
बतला
भी
दो
कि
रात
में
देखा
है
ख़्वाब
क्या
Dharamraj deshraj
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पास
आकर
जरा
सा
वो
बैठे
मेरे
अश'आर
सुनके
रो
बैठे
वो
मिरे
ग़म
में
मुस्कुराये
हैं
अपनी
तहज़ीब
यार
खो
बैठे
जिसने
चैनो-क़रार
छीना
है
हम
जहाँ
में
उसी
के
हो
बैठे
फूल
ग़ज़लों
के
लहलहाएंगे
शब्द
काग़ज़
पे
आज
बो
बैठे
मुस्कुराने
की
दी
क़सम
उसने
ग़म
की
दौलत
भी
आज
खो
बैठे
अश्क़
अपने
छुपाना
चाहा
था
अपना
दामन
मगर
भिगो
बैठे
ग़म
के
दरिया
को
पार
करना
था
दिल
की
कश्ती
"धरम"डुबो
बैठे
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Dharamraj deshraj
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