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Dharamraj deshraj
zakhm kuch-kuch bhar chale ya yuñ kaho
zakhm kuch-kuch bhar chale ya yuñ kaho | ज़ख़्म कुछ-कुछ भर चले या यूँँ कहो
- Dharamraj deshraj
ज़ख़्म
कुछ-कुछ
भर
चले
या
यूँँ
कहो
ज़िन्दगी
फिर
से
शुरू
होने
लगी
- Dharamraj deshraj
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ज़िक्र
तुम्हारा
बहुत
ज़रूरी
इन
ग़ज़लों
में
जानेमन
चाय
बिना
अदरक
को
डाले
अच्छी
थोड़ी
बनती
है
Tanoj Dadhich
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दुखे
हुए
लोगों
की
दुखती
रग
को
छूना
ठीक
नहीं
वक़्त
नहीं
पूछा
करते
हैं
यारों
वक़्त
के
मारों
से
Vashu Pandey
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पहले
पानी
को
और
हवा
को
बचाओ
ये
बचा
लो
तो
फिर
ख़ुदा
को
बचाओ
Swapnil Tiwari
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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मैं
तो
मुद्दत
से
ग़ैर-हाज़िर
हूँ
बस
मेरा
नाम
है
रजिस्टर
में
याद
करती
हैं
तुझको
दीवारें
शक्ल
उभर
आई
है
पलस्तर
में
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Azhar Nawaz
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जब
ज़रा
रात
हुई
और
मह
ओ
अंजुम
आए
बार-हा
दिल
ने
ये
महसूस
किया
तुम
आए
Asad Bhopali
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यारो
कुछ
तो
ज़िक्र
करो
तुम
उस
की
क़यामत
बाँहों
का
वो
जो
सिमटते
होंगे
उन
में
वो
तो
मर
जाते
होंगे
Jaun Elia
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शब
की
आग़ोश
में
महताब
उतारा
उस
ने
मेरी
आँखों
में
कोई
ख़्वाब
उतारा
उस
ने
Azm Shakri
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पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ
था
हर
नग़्मा-ए-कृष्ण
बाँसुरी
का
Hasrat Mohani
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इक
रोज़
इक
नदी
के
किनारे
मिलेंगे
हम
इक
दूसरे
से
अपना
पता
पूछते
हुए
Shahbaz Rizvi
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ग़मज़दा
हूँ
ज़रा
दवा
भेजो
वर्ना
यारब
मुझे
बुला
भेजो
की
दु'आ
माँ
से
उस
जहाँ
से
मुझे
अपने
जैसा
कोई
ख़ुदा
भेजो
ख़त
लिखा
और
इल्तिज़ा
ये
की
दर्द
भेजो
तो
अलहदा
भेजो
फिर
नए
सब्ज़ो-बाग़
ही
लिखकर
मुझको
जीने
का
आसरा
भेजो
सुर्ख़
मौसम
जला
न
दे
यारब
फूल
,
ख़ुश्बू
नई
हवा
भेजो
ख़त
लबों
से
ज़रा-
ज़रा
छूकर
एक
लम्हा
ही
ख़ुशनुमा
भेजो
ऐब
मेरे
'धरम'
नज़र
आएँ
मुझको
ऐसा
इक
आईना
भेजो
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Dharamraj deshraj
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हमने
सलाम
अर्ज़
कहा
अपने
यार
से
वो
राम-राम
कहके
गले
से
लिपट
गया
Dharamraj deshraj
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ऐ
चाँद
बादलों
से
निकल
आ
तो
सामने
लेंगे
हज़ार
मर्तबा
बोसे
नज़र
से
हम
Dharamraj deshraj
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दिल
के
ज़ख़्मों
की
निशानी
और
है
ख़ून
सा
आँखों
में
पानी
और
है
जान
देते
थे
फ़क़त
इक
बात
पर
वो
जवानी
ये
जवानी
और
है
कर
लिया
वा'दा
तो
फिर
सोचा
नहीं
बात
मेरी
ख़ानदानी
और
है
फ़ैसले
उसके
सदा
होते
सही
मेरे
रब
की
हुक्मरानी
और
है
भूख,
दौलत
या
के
शौहरत
की
नहीं
शे'र
का
मेरे
मआनी
और
है
प्यार
है
लालो-गुहरस
आपको
हाँ
मगर
मेरी
कहानी
और
है
दिख
रहा
जैसा
नहीं
वैसा
'धरम'
इस
हक़ीक़त
में
कहानी
और
है
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Dharamraj deshraj
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दर्द
होता
है
मुस्कुराने
में
कितना
मजबूर
हूँ
ज़माने
में
लुत्फ़
आता
है
ग़म
उठाने
में
ख़ुश
हूँ
अपने
ग़रीब
खा़ने
में
ज़ख़्म
भरते
ज़ुरूर
हैं
लेकिन
वक़्त
लगता
है
ग़म
भुलाने
में
जब
न
होगा
रक़ीब
तू
जग
में
ज़िक्र
होगा
मिरे
फ़साने
में
एक
दूजे
के
बाँट
लेंगें
ग़म
आ
भी
जाओ
गरीबखाने
में।
घर
बुलाता
हूँ
इसलिए
उनको
कुछ
उजाला
हो
आशियाने
में।
मान
भी
जाइये
कहा
दिल
का
फ़ायदा
क्या
है
क़समसाने
में।
दूसरा
तुम"धरम"
न
पाओगे
ढूंढ़कर
देख
लो
ज़माने
में।
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Dharamraj deshraj
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