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Dharamraj deshraj
paas aakar jara sa vo baithe
paas aakar jara sa vo baithe | पास आकर जरा सा वो बैठे
- Dharamraj deshraj
पास
आकर
जरा
सा
वो
बैठे
मेरे
अश'आर
सुनके
रो
बैठे
वो
मिरे
ग़म
में
मुस्कुराये
हैं
अपनी
तहज़ीब
यार
खो
बैठे
जिसने
चैनो-क़रार
छीना
है
हम
जहाँ
में
उसी
के
हो
बैठे
फूल
ग़ज़लों
के
लहलहाएंगे
शब्द
काग़ज़
पे
आज
बो
बैठे
मुस्कुराने
की
दी
क़सम
उसने
ग़म
की
दौलत
भी
आज
खो
बैठे
अश्क़
अपने
छुपाना
चाहा
था
अपना
दामन
मगर
भिगो
बैठे
ग़म
के
दरिया
को
पार
करना
था
दिल
की
कश्ती
"धरम"डुबो
बैठे
- Dharamraj deshraj
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न
उन
लबों
पे
तबस्सुम
न
फूल
शाख़ों
पर
गुज़र
गए
हैं
जो
मौसम
गुज़रने
वाले
थे
Kaif Uddin Khan
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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मदमस्त
महकते
फूलों
को
इन
कलियों
को
चूमा
जाए
इक
ख़्वाहिश
मेरी
यह
भी
है
तेरी
गलियों
में
घूमा
जाए
Akash Rajpoot
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मैं
बाग़
में
जिस
जगह
खड़ा
हूँ
हर
फूल
से
काम
चल
रहा
है
Shaheen Abbas
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सुलग
रहे
थे
शजर
दिल
तमाम
भँवरों
के
दिल
अपना
वार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
बहुत
मलाल
हुआ
देखकर
गुलिस्ताँ
में
तमाचा
मार
रहा
था
कोई
रुख़-ए-गुल
पर
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Shajar Abbas
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तोहफ़ा,
फूल,
शिकायत,
कुछ
तो
लेकर
जा
इश्क़
से
मिलने
ख़ाली
हाथ
नहीं
जाते
Tanoj Dadhich
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मिरे
ही
वास्ते
लाया
है
दोनो
फूल
और
ख़ंजर
मुझे
ये
देखना
है
बस
वो
पहले
क्या
उठाता
है
Parul Singh "Noor"
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काँटे
बनकर
वापस
क्यूँँ
आ
जाते
हैं?
हमने
तुमको
फूल
जो
भेजे
होते
हैं
Riyaz Tariq
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आज
भी
शायद
कोई
फूलों
का
तोहफ़ा
भेज
दे
तितलियाँ
मंडला
रही
हैं
काँच
के
गुल-दान
पर
Shakeb Jalali
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दूर
इक
सितारा
है
और
वो
हमारा
है
आँख
तक
नहीं
लगती
कोई
इतना
प्यारा
है
छू
के
देखना
उसको
क्या
अजब
नज़ारा
है
तीर
आते
रहते
थे
फूल
किसने
मारा
है
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Kafeel Rana
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मेरे
हक़
में
दु'आ
करे
कोई
जी
रहा
क्यूँ
पता
करे
कोई
चाहते
हो
ख़ुशी
मिले
हमको
क्यूँ
किसी
का
बुरा
करे
कोई
यार
रब
को
भुला
नहीं
देना
दर्द
बे-शक
दिया
करे
कोई
आह
होंठों
पे
आँख
में
आँसू
क्या
हुआ
है
पता
करे
कोई
हम
सेफ़र
की
तलाश
में
गुम
हूँ
बन
के
साया
चला
करे
कोई
अपने
मतलब
से
यार
मिलते
हैं
बेसबब
भी
मिला
करे
कोई
राज़
मेरी
ख़ुशी
का
है
इतना
शा'इरी
का
नशा
करे
कोई
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Dharamraj deshraj
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ज़िन्दगी
का
नहीं
था
जब
मक़सद
मौत
का
इंतज़ार
था
मुझको
Dharamraj deshraj
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आह
जब
आसमान
तक
पहुँची
रौशनी
तब
मकान
तक
पहुँची
ज़ब्त
कब
तक
तेरे
सितम
करता
अब
शिकायत
बयान
तक
पहुँची
बढ़
गया
दर्द
या
हुआ
ऐसा
ज़िन्दगी
इम्तिहान
तक
पहुँची
दर्द
के
साथ
में
मुहब्बत
थी
शा'इरी
हर
ज़बान
तक
पहुँची
आ
रहा
इंक़िलाब
दुनिया
में
शुक्र
है
बात
कान
तक
पहुँची
आँख
से
ख़ूँ
बहा
है
तब
जाकर
शा'इरी
आसमान
तक
पहुँची
दर्द
जब
जब
'धरम'
ने
पाया
है
बेज़ुबानी
ज़बान
तक
पहुँची
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Dharamraj deshraj
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करके
बुलन्द
हौसला
निकले
जो
घर
से
हम
काँटों
ने
छोड़ा
रास्ता
गुज़रे
जिधर
से
हम
Dharamraj deshraj
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लोग
भूलेंगे
मुहब्बत
जिस
दिन
बस
उसी
रोज़
क़यामत
होगी
Dharamraj deshraj
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