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Dharamraj deshraj
zindagi ka nahin tha jab maqsad
zindagi ka nahin tha jab maqsad | ज़िन्दगी का नहीं था जब मक़सद
- Dharamraj deshraj
ज़िन्दगी
का
नहीं
था
जब
मक़सद
मौत
का
इंतज़ार
था
मुझको
- Dharamraj deshraj
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बहुत
हसीन
सही
सोहबतें
गुलों
की
मगर
वो
ज़िंदगी
है
जो
काँटों
के
दरमियाँ
गुज़रे
Jigar Moradabadi
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छोड़कर
तन्हा
मुझे
जन्नत
में
रहने
लग
गए
हो
और
मैंने
ज़िन्दगीं
कर
ली
जहन्नम
शा'इरी
में
"Nadeem khan' Kaavish"
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मौत
का
भी
इलाज
हो
शायद
ज़िंदगी
का
कोई
इलाज
नहीं
Firaq Gorakhpuri
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किया
बादलों
में
सफ़र
ज़िंदगी
भर
ज़मीं
पर
बनाया
न
घर
ज़िंदगी
भर
सभी
ज़िंदगी
के
मज़े
लूटते
हैं
न
आया
हमें
ये
हुनर
ज़िंदगी
भर
मोहब्बत
रही
चार
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
चार
दिन
का
असर
ज़िंदगी
भर
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Anwar Shaoor
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तुम्हें
भी
साँस
लेने
की
कमी
हो
तुम्हें
भी
ज़िंदगी
ठुकरा
के
जाए
Ambar
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लाई
है
किस
मक़ाम
पे
ये
ज़िंदगी
मुझे
महसूस
हो
रही
है
ख़ुद
अपनी
कमी
मुझे
Ali Ahmad Jalili
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ज़िंदगी
में
आई
वो
जैसे
मेरी
तक़दीर
हो
और
उसी
तक़दीर
से
फिर
चोट
खाना
याद
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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ये
ज़मीं
किस
क़दर
सजाई
गई
ज़िंदगी
की
तड़प
बढ़ाई
गई
आईने
से
बिगड़
के
बैठ
गए
जिन
की
सूरत
जिन्हें
दिखाई
गई
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Sahir Ludhianvi
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ज़िंदगी
तुझ
से
भी
क्या
ख़ूब
त'अल्लुक़
है
मिरा
जैसे
सूखे
हुए
पत्ते
से
हवा
का
रिश्ता
Khalish Akbarabadi
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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पास
आकर
जरा
सा
वो
बैठे
मेरे
अश'आर
सुनके
रो
बैठे
वो
मिरे
ग़म
में
मुस्कुराये
हैं
अपनी
तहज़ीब
यार
खो
बैठे
जिसने
चैनो-क़रार
छीना
है
हम
जहाँ
में
उसी
के
हो
बैठे
फूल
ग़ज़लों
के
लहलहाएंगे
शब्द
काग़ज़
पे
आज
बो
बैठे
मुस्कुराने
की
दी
क़सम
उसने
ग़म
की
दौलत
भी
आज
खो
बैठे
अश्क़
अपने
छुपाना
चाहा
था
अपना
दामन
मगर
भिगो
बैठे
ग़म
के
दरिया
को
पार
करना
था
दिल
की
कश्ती
"धरम"डुबो
बैठे
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Dharamraj deshraj
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मेरा
दुश्मन
भी
मोतबर
न
हुआ
आँसुओं
का
मिरे
असर
न
हुआ।
आदमी
हैं
मगर
नहीं
इन्साँ
एक
जंगल
है
जो
नगर
न
हुआ।
उम्र
गुज़री
मिली
नहीं
मंज़िल
ख़त्म
आख़िर
मेरा
सफ़र
न
हुआ।
वो
मिरे
ग़म
में
यार
हँसता
है
वो
भी
पत्थर
है
राहबर
न
हुआ।
मुद्दतों
से
हँसी
नहीं
आई
ग़म
मिरा
है
कि
मुख़्तसर
न
हुआ।
ग़म
भुलाए
नहीं
बना
यारो
जाम
पीकर
भी
बेख़बर
न
हुआ।
बद्दुआएँ
बहुत
दीं
यारो
ने
मुझपे
अफ़सोस
कुछ
असर
न
हुआ।
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Dharamraj deshraj
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जो
ग़ज़ल
आपको
सुनाई
थी
ज़िन्दगी
भर
की
वो
कमाई
थी
उनको
हमने
भुला
दिया
कब
का
भूल
जाने
में
ही
भलाई
थी
दर्द
दिल
में
था
आँख
मैं
आँसू
मुस्कुराने
में
जग
हँसाई
थी
मौत
से
क्या
गिला
करें
आख़िर
ज़िन्दगी
चीज़
ही
पराई
थी
अश्क़
आँखों
में
आ
गए
मेरी
उसने
इतनी
ख़ुशी
जताई
थी
वो
ख़यालों
में
आ
गए
आख़िर
दिल
ने
आवाज़
भर
लगाई
थी
बे-वफ़ा
को
'धरम'
सुना
छिपकर
उसके
लब
पर
मिरी
रुबाई
थी
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Dharamraj deshraj
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दुश्मनों
के
लिए
दु'आ
की
थी
अपने
ग़म
की
यही
दवा
की
थी
ग़म
में
हँसना
ख़ुशी
में
रो
देना
ज़िन्दगी
अपनी
यूँँ
फ़ना
की
थी
जो
सज़ा
मिल
रही
ज़माने
से
हमने
उतनी
नहीं
ख़ता
की
थी
ख़्वाब
ख़ुशियों
के
देखते
रहना
दर्द
की
हमने
यूँँ
दवा
की
थी
दर्द
सीने
में
पाल
कर
हमने
शा'इरी
की
यूँँ
इब्तिदा
की
थी
हमने
मंज़िल
की
जुस्तजू
करके
ज़िन्दगी
अपनी
ख़ुशनुमा
की
थी
सुख
का
एहसास
वो
'धरम'
कैसा
जब
किसी
के
लिए
दु'आ
की
थी
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Dharamraj deshraj
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ज़िन्दगी
तू
आज़माना
छोड़
दे
मौत
से
कह
दे
बहाना
छोड़
दे
फूँकने
के
काम
वो
आता
मकाँ
जब
परिन्दा
आशियाना
छोड़
दे
यार
क़िस्मत
से
भी
भागा
है
कोई
बेसबब
आँसू
बहाना
छोड़
दे
छोड़
दूँ
उसकी
गली
उसका
नगर
वो
मिरे
ख़्वाबों
में
आना
छोड़
दे
यार
तू
माता-पिता
को
रब
समझ
हर
कहीं
भी
सर
झुकाना
छोड़
दे
फूल
के
बदले
जहाँ
काँटे
मिलें
ऐसे
तू
रिश्ते
निभाना
छोड़
दे
चाँद
पाने
के
लिए
नादाँ
'धरम'
हो
सके
तो
कसमसाना
छोड़
दे
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