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Dharamraj deshraj
miraa dushman bhi motabar na hua
miraa dushman bhi motabar na hua | मेरा दुश्मन भी मोतबर न हुआ
- Dharamraj deshraj
मेरा
दुश्मन
भी
मोतबर
न
हुआ
आँसुओं
का
मिरे
असर
न
हुआ।
आदमी
हैं
मगर
नहीं
इन्साँ
एक
जंगल
है
जो
नगर
न
हुआ।
उम्र
गुज़री
मिली
नहीं
मंज़िल
ख़त्म
आख़िर
मेरा
सफ़र
न
हुआ।
वो
मिरे
ग़म
में
यार
हँसता
है
वो
भी
पत्थर
है
राहबर
न
हुआ।
मुद्दतों
से
हँसी
नहीं
आई
ग़म
मिरा
है
कि
मुख़्तसर
न
हुआ।
ग़म
भुलाए
नहीं
बना
यारो
जाम
पीकर
भी
बेख़बर
न
हुआ।
बद्दुआएँ
बहुत
दीं
यारो
ने
मुझपे
अफ़सोस
कुछ
असर
न
हुआ।
- Dharamraj deshraj
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जिस
मौसम
में
भीगना
है
हम
दोनों
को
उस
मौसम
में
पूछ
रही
हो
छाता
है
Zubair Alam
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उसे
पागल
बनाती
फिर
रही
हो
जिसे
शौहर
बनाना
चाहिए
था
Arvind Inaayat
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तन्हा
ही
सही
लड़
तो
रही
है
वो
अकेली
बस
थक
के
गिरी
है
अभी
हारी
तो
नहीं
है
Ali Zaryoun
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अब
उसकी
शादी
का
क़िस्सा
न
छेड़ो
बस
इतना
कह
दो
कैसी
लग
रही
थी
Zubair Ali Tabish
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उन्हीं
रास्तों
ने
जिन
पर
कभी
तुम
थे
साथ
मेरे
मुझे
रोक
रोक
पूछा
तिरा
हम-सफ़र
कहाँ
है
Bashir Badr
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वो
आँखें
चुप
थीं
लेकिन
हँस
रही
थीं
मेरा
जी
कर
रहा
था
चूम
लूँ
अब
Ritesh Rajwada
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जब
भी
कोई
मंज़िल
हासिल
करता
हूँ
याद
बहुत
आती
हैं
तेरी
ता'रीफ़ें
Tanoj Dadhich
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बर्बाद
कर
दिया
हमें
परदेस
ने
मगर
माँ
सब
से
कह
रही
है
कि
बेटा
मज़े
में
है
Munawwar Rana
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सुखाई
जा
रही
है
जुल्फ़
धोकर
घटा
या'नी
निचोड़ी
जा
रही
है
Satya Prakash Soni
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मंज़िल
पे
न
पहुँचे
उसे
रस्ता
नहीं
कहते
दो
चार
क़दम
चलने
को
चलना
नहीं
कहते
इक
हम
हैं
कि
ग़ैरों
को
भी
कह
देते
हैं
अपना
इक
तुम
हो
कि
अपनों
को
भी
अपना
नहीं
कहते
कम-हिम्मती
ख़तरा
है
समुंदर
के
सफ़र
में
तूफ़ान
को
हम
दोस्तो
ख़तरा
नहीं
कहते
बन
जाए
अगर
बात
तो
सब
कहते
हैं
क्या
क्या
और
बात
बिगड़
जाए
तो
क्या
क्या
नहीं
कहते
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Nawaz Deobandi
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लोग
भूलेंगे
मुहब्बत
जिस
दिन
बस
उसी
रोज़
क़यामत
होगी
Dharamraj deshraj
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जाते-जाते
वो
निशानी
दे
गया
मेरे
ज़ख़्मों
को
जवानी
दे
गया
साथ
उसके
ही
गईं
सारी
ख़ुशी
मेरे
अश्क़ों
को
रवानी
दे
गया
शुक्रिया
सौ
मर्तबा
उस
यार
का
ज़ीस्त
को
मेरे
जो
मानी
दे
गया
वक़्त
बेहद
ही
बुरा
जाते
हुए
बरक़तें
पर
आसमानी
दे
गया
यूँँ
जिओ
मरने
पे
दुनियाँ
ये
कहे
मौत
को
भी
ज़िंदगानी
दे
गया
ख्बाब
ख़ुशियों
का
भला
आया
मुझे
याद
कुछ
अपनी
सुहानी
दे
गया
बाद
मरने
के
जहाँ
बोले
'धरम'
अपने
ग़म
की
तर्जुमानी
दे
गया
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Dharamraj deshraj
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देना
ही
है
जो
कुछ
तो
उसे
ज़ख़्म
दीजिये
एहसान
भूल
जाएगा
कम्बख़्त
आदमी
Dharamraj deshraj
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ज़ख़्म
कुछ-कुछ
भर
चले
या
यूँँ
कहो
ज़िन्दगी
फिर
से
शुरू
होने
लगी
Dharamraj deshraj
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आह
जब
आसमान
तक
पहुँची
रौशनी
तब
मकान
तक
पहुँची
ज़ब्त
कब
तक
तेरे
सितम
करता
अब
शिकायत
बयान
तक
पहुँची
बढ़
गया
दर्द
या
हुआ
ऐसा
ज़िन्दगी
इम्तिहान
तक
पहुँची
दर्द
के
साथ
में
मुहब्बत
थी
शा'इरी
हर
ज़बान
तक
पहुँची
आ
रहा
इंक़िलाब
दुनिया
में
शुक्र
है
बात
कान
तक
पहुँची
आँख
से
ख़ूँ
बहा
है
तब
जाकर
शा'इरी
आसमान
तक
पहुँची
दर्द
जब
जब
'धरम'
ने
पाया
है
बेज़ुबानी
ज़बान
तक
पहुँची
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Dharamraj deshraj
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