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Dharamraj deshraj
meraa dushman mujhi ko bhool gaya
meraa dushman mujhi ko bhool gaya | मेरा दुश्मन मुझी को भूल गया
- Dharamraj deshraj
मेरा
दुश्मन
मुझी
को
भूल
गया
प्यार
में
दुश्मनी
को
भूल
गया
आज
के
दौर
की
हक़ीक़त
है
आदमी,
आदमी
को
भूल
गया
तुमको
दिल
में
बिठा
लिया
जब
से
मैं
तुम्हारी
कमी
को
भूल
गया
ज़िन्दगी
क्या
है
जब
से
जाना
है
दर्द-ओ-ग़म
और
ख़ुशी
को
भूल
गया
खाई
जब
से
क़सम
न
पीने
की
भूल
से
मयकशी
को
भूल
गया
रब
ने
क्या
कुछ
नहीं
दिया
मुझको
उसकी
दरिया
दिली
को
भूल
गया
यार
दौलत
ग़मों
की
दे
मुझको
क्या
मिरी
मुफ़लिसी
को
भूल
गया
- Dharamraj deshraj
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पराई
आग
पे
रोटी
नहीं
बनाऊँगा
मैं
भीग
जाऊँगा
छतरी
नहीं
बनाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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भूख
है
तो
सब्र
कर,
रोटी
नहीं
तो
क्या
हुआ
आजकल
दिल्ली
में
है
ज़ेर-ए-बहस
ये
मुद्दआ
Dushyant Kumar
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धूप
पड़े
उस
पर
तो
तुम
बादल
बन
जाना
अब
वो
मिलने
आए
तो
उसको
घर
ठहराना।
तुमको
दूर
से
देखते
देखते
गुज़र
रही
है
मर
जाना
पर
किसी
गरीब
के
काम
न
आना।
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Tehzeeb Hafi
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सुनहरी
लड़कियों
इनको
मिलो
मिलो
न
मिलो
ग़रीब
होते
हैं
बस
ख़्वाब
देखने
के
लिए
Abbas Tabish
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ये
टूटी
चटाई
ये
मिटटी
का
बर्तन
हिकारत
से
नादान
क्या
देखता
है
गरीबी
मोहम्मद
के
घर
में
पली
है
मेरे
घर
का
सामान
क्या
देखता
है
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Anjuman rahi raza
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उस
ने
वा'दा
किया
है
आने
का
रंग
देखो
ग़रीब
ख़ाने
का
Josh Malihabadi
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बड़े
नादान
हो
तुम
भी
ज़रा
समझा
करो
बातें
गले
मिलकर
जो
रोती
है
बिछड़कर
कितना
रोएगी
Ankita Singh
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खड़ा
हूँ
आज
भी
रोटी
के
चार
हर्फ़
लिए
सवाल
ये
है
किताबों
ने
क्या
दिया
मुझ
को
Nazeer Baaqri
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सुनते
हैं
इश्क़
नाम
के
गुज़रे
हैं
इक
बुज़ुर्ग
हम
लोग
भी
फ़क़ीर
इसी
सिलसिले
के
हैं
Firaq Gorakhpuri
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न
जाने
कौन
सी
दौलत
अता
करता
है
रब
इनको
किसी
भी
बाप
को
मुफ़्लिस
कभी
देखा
नहीं
मैंने
Saheb Shrey
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जो
ग़ज़ल
आपको
सुनाई
थी
ज़िन्दगी
भर
की
वो
कमाई
थी
उनको
हमने
भुला
दिया
कब
का
भूल
जाने
में
ही
भलाई
थी
दर्द
दिल
में
था
आँख
मैं
आँसू
मुस्कुराने
में
जग
हँसाई
थी
मौत
से
क्या
गिला
करें
आख़िर
ज़िन्दगी
चीज़
ही
पराई
थी
अश्क़
आँखों
में
आ
गए
मेरी
उसने
इतनी
ख़ुशी
जताई
थी
वो
ख़यालों
में
आ
गए
आख़िर
दिल
ने
आवाज़
भर
लगाई
थी
बे-वफ़ा
को
'धरम'
सुना
छिपकर
उसके
लब
पर
मिरी
रुबाई
थी
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Dharamraj deshraj
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मेरा
दुश्मन
भी
मोतबर
न
हुआ
आँसुओं
का
मिरे
असर
न
हुआ।
आदमी
हैं
मगर
नहीं
इन्साँ
एक
जंगल
है
जो
नगर
न
हुआ।
उम्र
गुज़री
मिली
नहीं
मंज़िल
ख़त्म
आख़िर
मेरा
सफ़र
न
हुआ।
वो
मिरे
ग़म
में
यार
हँसता
है
वो
भी
पत्थर
है
राहबर
न
हुआ।
मुद्दतों
से
हँसी
नहीं
आई
ग़म
मिरा
है
कि
मुख़्तसर
न
हुआ।
ग़म
भुलाए
नहीं
बना
यारो
जाम
पीकर
भी
बेख़बर
न
हुआ।
बद्दुआएँ
बहुत
दीं
यारो
ने
मुझपे
अफ़सोस
कुछ
असर
न
हुआ।
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Dharamraj deshraj
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मेरा
मासूम
बचपन
था
भूखा
बहुत
लोरियां
माँ
सुनाती
रही
रात
भर
Dharamraj deshraj
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हमने
सलाम
अर्ज़
कहा
अपने
यार
से
वो
राम-राम
कहके
गले
से
लिपट
गया
Dharamraj deshraj
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आह
जब
आसमान
तक
पहुँची
रौशनी
तब
मकान
तक
पहुँची
ज़ब्त
कब
तक
तेरे
सितम
करता
अब
शिकायत
बयान
तक
पहुँची
बढ़
गया
दर्द
या
हुआ
ऐसा
ज़िन्दगी
इम्तिहान
तक
पहुँची
दर्द
के
साथ
में
मुहब्बत
थी
शा'इरी
हर
ज़बान
तक
पहुँची
आ
रहा
इंक़िलाब
दुनिया
में
शुक्र
है
बात
कान
तक
पहुँची
आँख
से
ख़ूँ
बहा
है
तब
जाकर
शा'इरी
आसमान
तक
पहुँची
दर्द
जब
जब
'धरम'
ने
पाया
है
बेज़ुबानी
ज़बान
तक
पहुँची
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Dharamraj deshraj
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