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Dharamraj deshraj
meraa maasoom bachpan tha bhookha bahut
meraa maasoom bachpan tha bhookha bahut | मेरा मासूम बचपन था भूखा बहुत
- Dharamraj deshraj
मेरा
मासूम
बचपन
था
भूखा
बहुत
लोरियां
माँ
सुनाती
रही
रात
भर
- Dharamraj deshraj
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निगाहें
फेर
ली
घबरा
के
मैंने
वो
तुम
से
ख़ूब-सूरत
लग
रही
थी
Fahmi Badayuni
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जिस
मौसम
में
भीगना
है
हम
दोनों
को
उस
मौसम
में
पूछ
रही
हो
छाता
है
Zubair Alam
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मेरे
होंठों
के
सब्र
से
पूछो
उसके
हाथों
से
गाल
तक
का
सफ़र
Mehshar Afridi
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बहुत
क़रीब
रही
है
ये
ज़िन्दगी
हम
से
बहुत
अज़ीज़
सही
ए'तिबार
कुछ
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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मुसाफ़िरों
के
दिमाग़ों
में
डर
ज़ियादा
है
न
जाने
वक़्त
है
कम
या
सफ़र
ज़ियादा
है
Hashim Raza Jalalpuri
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तन्हा
ही
सही
लड़
तो
रही
है
वो
अकेली
बस
थक
के
गिरी
है
अभी
हारी
तो
नहीं
है
Ali Zaryoun
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उन्हीं
रास्तों
ने
जिन
पर
कभी
तुम
थे
साथ
मेरे
मुझे
रोक
रोक
पूछा
तिरा
हम-सफ़र
कहाँ
है
Bashir Badr
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मुझ
में
अब
मैं
नहीं
रही
बाक़ी
मैं
ने
चाहा
है
इस
क़दर
तुम
को
Ambreen Haseeb Ambar
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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न
जाने
कैसी
महक
आ
रही
है
बस्ती
से
वही
जो
दूध
उबलने
के
बाद
आती
है
Munawwar Rana
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ग़मज़दा
हूँ
ज़रा
दवा
भेजो
वर्ना
यारब
मुझे
बुला
भेजो
की
दु'आ
माँ
से
उस
जहाँ
से
मुझे
अपने
जैसा
कोई
ख़ुदा
भेजो
ख़त
लिखा
और
इल्तिज़ा
ये
की
दर्द
भेजो
तो
अलहदा
भेजो
फिर
नए
सब्ज़ो-बाग़
ही
लिखकर
मुझको
जीने
का
आसरा
भेजो
सुर्ख़
मौसम
जला
न
दे
यारब
फूल
,
ख़ुश्बू
नई
हवा
भेजो
ख़त
लबों
से
ज़रा-
ज़रा
छूकर
एक
लम्हा
ही
ख़ुशनुमा
भेजो
ऐब
मेरे
'धरम'
नज़र
आएँ
मुझको
ऐसा
इक
आईना
भेजो
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Dharamraj deshraj
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मेरा
दुश्मन
मुझी
को
भूल
गया
प्यार
में
दुश्मनी
को
भूल
गया
आज
के
दौर
की
हक़ीक़त
है
आदमी,
आदमी
को
भूल
गया
तुमको
दिल
में
बिठा
लिया
जब
से
मैं
तुम्हारी
कमी
को
भूल
गया
ज़िन्दगी
क्या
है
जब
से
जाना
है
दर्द-ओ-ग़म
और
ख़ुशी
को
भूल
गया
खाई
जब
से
क़सम
न
पीने
की
भूल
से
मयकशी
को
भूल
गया
रब
ने
क्या
कुछ
नहीं
दिया
मुझको
उसकी
दरिया
दिली
को
भूल
गया
यार
दौलत
ग़मों
की
दे
मुझको
क्या
मिरी
मुफ़लिसी
को
भूल
गया
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Dharamraj deshraj
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दोस्ती
की
अभी
अभी
उन
सेे
ज़ख़्म
हमको
अभी
से
मिलते
हैं
Dharamraj deshraj
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अश्क
अपने
पिया
करे
कोई
शा'इरी
का
नशा
करे
कोई
आँख
से
ख़ून-ए-दिल
टपकता
है
मेरे
ग़म
की
दवा
करे
कोई
ज़ख़्म
के
साथ
दे
मुझे
मरहम
या
ख़ुदा
ये
ख़ता
करे
कोई
दर्द
सौगात
में
नहीं
लूँगा
उन
सेे
जाकर
मना
कर
कोई
ख़्वाब
में
आज
मिलने
आना
है
आपसे
इल्तिज़ा
करे
कोई
जाने
वाले
ज़रा
ठहर
जाना
मिल
गया
मुझ
सेा
क्या
भला
कोई
गर
भलाई
"धरम"
न
हो
पाए
क्यूँ
किसी
का
बुरा
करे
कोई
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Dharamraj deshraj
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दर्द
सीने
में
पालकर
रखना
शर्त
पहली
है
शा'इरी
के
लिए
Dharamraj deshraj
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