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Armaan khan
usko jo mere pyaar pe vishwas nahin hai
usko jo mere pyaar pe vishwas nahin hai | उसको जो मेरे प्यार पे विश्वास नहीं है
- Armaan khan
उसको
जो
मेरे
प्यार
पे
विश्वास
नहीं
है
ख़ुद
मुझको
मेरे
प्यार
पे
शक
होने
लगा
है
- Armaan khan
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हमारे
बाद
तेरे
इश्क़
में
नए
लड़के
बदन
तो
चू
मेंगे
ज़ुल्फ़ें
नहीं
सँवारेंगे
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Vikram Gaur Vairagi
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कोई
तो
पूछे
मोहब्बत
के
इन
फ़रिश्तों
से
वफ़ा
का
शौक़
ये
बिस्तर
पे
क्यूँ
उतर
आया
Harsh saxena
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कभी
कभी
तो
झगड़ने
का
जी
भी
चाहेगा
मगर
ये
जंग
मोहब्बत
से
जीती
जाएगी
Amaan Abbas Naqvi
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किसे
है
वक़्त
मोहब्बत
में
दर-ब-दर
भटके
मैं
उसके
शहर
गया
था
किसी
ज़रूरत
से
Riyaz Tariq
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किसी
के
इश्क़
में
बर्बाद
होना
हमें
आया
नहीं
फ़रहाद
होना
Manish Shukla
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फिर
वही
रोना
मुहब्बत
में
गिला
शिकवा
जहाँ
से
रस्म
है
बस
इसलिए
भी
तुम
को
साल-ए-नौ
मुबारक
Neeraj Neer
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ये
इश्क़
भी
मुझे
लगता
है
बेटियों
की
तरह
जो
माँगता
है
अमूमन
उसे
नहीं
मिलता
Dipendra Singh 'Raaz'
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इसी
फ़कीर
की
गफ़लत
से
आगही
ली
है
मेरे
चराग़
से
सूरज
ने
रौशनी
ली
है
गली-गली
में
भटकता
है
शोर
करता
हुआ
हमारे
इश्क़
ने
सस्ती
शराब
पी
ली
है
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Ammar Iqbal
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सँभलने
के
लिए
कर
ली
मुहब्बत
मगर
इस
में
फिसलना
चाहिए
था
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Divy Kamaldhwaj
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हर
किसी
से
ही
मुहब्बत
माँगता
है
दिल
तो
अब
सब
सेे
अक़ीदत
माँगता
है
सीख
आया
है
सलीक़ा
ग़ुफ़्तगू
का
मुझ
सेे
मेरा
दोस्त
इज़्ज़त
माँगता
है
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हुस्न
का
इम्कान
समझा
देर
से
मैं
नफ़ा-नुक़्सान
समझा
देर
से
उसके
'आशिक़
उसके
बारे
में
मेरा
भर
रहे
थे
कान,समझा
देर
से
मुझको
पहले
दिन
से
उस
सेे
इश्क़
था
और
वो
नादान
समझा
देर
से
जो
समझना
ज़िन्दगी
की
शर्त
थी
उसको
ही
इंसान
समझा
देर
से
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Armaan khan
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शहर
की
भीड़,चकाचौंध
से
उकताए
हुए
ऐसे
उकताए
हुए
लोग
कहाँ
जीते
हैं
मुझ
सेे
मत
पूछ,मेरी
आँख
का
सूनापन
देख
तेरे
ठुकराए
हुए
लोग
कहाँ
जीते
हैं
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Armaan khan
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अब
तीरगी
परस्त
हैं
मसनद
नशीन
लोग
अब
ये
दु'आ
करो
कि
उजालों
की
ख़ैर
हो
ऐ
कातिब-ए-नसीब
मेरे
हक़
में
कुछ
तो
लिख
मंज़िल
नहीं
तो
पाँव
के
छालों
की
ख़ैर
हो
पूछा
है
दोस्ती
पे
किसी
ने
मुझे
सवाल
अब
क्या
कहूँ
मैं
छोड़िये,सालों
की
ख़ैर
हो
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Armaan khan
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है
ज़िन्दगी
से
इक
यही
गिला
मुझे
सभी
मिले,
मिला
नहीं
ख़ुदा
मुझे
कई
दिनों
से
ख़ुद
से
था
कटा-कटा
मैं
किस
सेे
पूछता
कि
क्या
हुआ
मुझे
ये
मो’जिज़ा
है
अब
तलक
हयात
हूँ
कई
दफ़ा
तो
इश्क़
भी
हुआ
मुझे।
जो
दूर
जा
चुका
उसे
ख़बर
करो
निगल
रहा
है
अब
ये
फ़ासला
मुझे
मैं
गाँव
आके
सोचता
हूँ
ऐ
ख़ुदा
लगे
न
शहर
की
कभी
हवा
मुझे
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Armaan khan
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तुम्हारा
ज़िक्र
चला
है
हमारे
घर
में
फिर
हम
एक
कोने
में
बैठे
हैं
मुस्कुरा
रहे
हैं
Armaan khan
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