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Armaan khan
tumhaara zikr chala hai hamaare ghar men phir
tumhaara zikr chala hai hamaare ghar men phir | तुम्हारा ज़िक्र चला है हमारे घर में फिर
- Armaan khan
तुम्हारा
ज़िक्र
चला
है
हमारे
घर
में
फिर
हम
एक
कोने
में
बैठे
हैं
मुस्कुरा
रहे
हैं
- Armaan khan
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अभी
ज़िंदा
है
माँ
मेरी
मुझे
कुछ
भी
नहीं
होगा
मैं
घर
से
जब
निकलता
हूँ
दु'आ
भी
साथ
चलती
है
Munawwar Rana
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कहाँ
रोते
उसे
शादी
के
घर
में
सो
इक
सूनी
सड़क
पर
आ
गए
हम
Shariq Kaifi
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तेरी
यादें
लिपट
जाती
हैं
मुझ
से
घर
पहुँचते
ही
कि
जैसे
बाप
से
आकर
कोई
बच्ची
लिपटती
है
Afzal Ali Afzal
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एक
मुद्दत
से
हैं
सफ़र
में
हम
घर
में
रह
कर
भी
जैसे
बेघर
से
Azhar Iqbal
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हमारे
घर
के
रिश्तों
में
अभी
बारीकियाँ
कम
हैं
भतीजा
मार
खाता
है
तो
चाचा
बोल
देते
हैं
Nirbhay Nishchhal
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हर
इक
सू
हैं
दर-ओ-दीवार
लेकिन
मुयस्सर
है
नहीं
घर-बार
लेकिन
Umrez Ali Haider
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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घर
की
इस
बार
मुकम्मल
मैं
तलाशी
लूँगा
ग़म
छुपा
कर
मिरे
माँ
बाप
कहाँ
रखते
थे
Unknown
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पास
मैं
जिसके
हूँ
वो
फिर
भी,
अच्छा
लड़का
ढूँढ़
रही
है
उसने
लगा
रक्खा
है
चश्मा,
और
वो
चश्मा
ढूँढ़
रही
है
फ़ोन
किया
मैंने
और
पूछा,
अब
तक
घर
से
क्यूँँ
नहीं
निकली
उस
ने
कहा
मुझ
सेे
मिलने
का,
एक
बहाना
ढूँढ़
रही
है
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Tanoj Dadhich
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ख़ून
से
जोड़ा
हुआ
हर
ईंट
ढेला
हो
गया
दो
तरफ़
चूल्हे
जले
औ'
घर
अकेला
हो
गया
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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सबको
हासिल
होने
में
कुछ
मजबूरी
क़ाएम
रख
सब
सेे
रिश्ते
रख
लेकिन
सब
सेे
दूरी
क़ाएम
रख
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Armaan khan
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थोड़ी
मिट्टी
गूँथ
और
इक
दिल
बना
कुछ
न
कर
रस्ते
को
ही
मंज़िल
बना
उसकी
हालत
पर
मैं
रोया
देर
तक
वो
मुझे
कहता
था
मुस्तक़बिल
बना
चाय
पर
चर्चा
चली
थी
इश्क़
पर
और
फिर
दोनों
का
अपना
बिल
बना
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Armaan khan
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कुछ
ख़्वाब
कभी
पूरे
नहीं
होने
यहाँ
पर
बोझिल
हैं
अगर
पलकें
तो
सामान
उतारो
तुम
जैसों
को
चाहा
था
कभी
मैंने
ग़ज़ब
है
आकर
के
किसी
रोज़
ये
एहसान
उतारो
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Armaan khan
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सवाल
इसका
नहीं
है
कि
क्यूँ
उदास
हूँ
मैं
अज़ाब
ये
है
कि
घर
जा
के
मुस्कुराना
है
Armaan khan
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सोचा
नहीं
कि
क्यूँ
मुझे
नाकामियाँ
मिलीं
जब
अपने
ही
वजूद
में
सौ
ख़ामियाँ
मिलीं
तन्हाइयों
से
तंग
था
मैं
पिछले
कुछ
दिनों
फिर
एक
दिन
मुझे
मेरी
परछाइयाँ
मिलीं
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Armaan khan
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