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Zohair Ahmad Sahil
ye darna kaisa darna hai
ye darna kaisa darna hai | ये डरना कैसा डरना है
- Zohair Ahmad Sahil
ये
डरना
कैसा
डरना
है
जब
मरना
तो
क्या
जीना
है
- Zohair Ahmad Sahil
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देखा
था
इक
ख़्वाब
किसी
ख़्वाब
में
छू
लिया
था
मैं
उन्हें
आदाब
में
हाथ
उठाया
था
वो
मेरी
तरफ़
देखते
मैं
रह
गया
तालाब
में
ख़ास
है
क्या
जो
मैं
सुनाऊँ
तुम्हें
यार
ही
था
खेल
के
ग़र्क़ाब
में
हारना
था
ही
नहीं
तक़दीर
में
सो
चला
वो
जीत
कर
अहबाब
में
सो
गया
था
वो
कहीं
पर
सहरा
में
जल
गया
'जोहैर'
इस
अलक़ाब
में
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Zohair Ahmad Sahil
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तुम्हें
दिल
में
बसाया
तो
सही
तुम्हें
अपना
बनाया
तो
सही
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तुम
से
कोई
शिकायत
नहीं
देखने
की
सियासत
नहीं
चादरों
में
लपेटा
हुआ
मैं
किसी
की
भी
हाजत
नहीं
वापसी
का
तो
इमकान
है
पर
किसी
से
रफ़ाक़त
नहीं
तुम
से
मिलकर
बदल
तो
गया
मुझ
में
कोई
शराफ़त
नहीं
मैं
भला
क्यूँ
उसे
देखता
मेरी
उन
सेे
क़यादत
नहीं
झड़
गए
पत्ते
एहसास
के
अब
किसी
तौर
उलफ़त
नहीं
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Zohair Ahmad Sahil
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ग़म
को
वीरान
बनाया
था
कभी
ऐसा
ईमान
बनाया
था
कभी
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ज़ीस्त
है
मुझ
सेे
ख़फ़ा
लेकिन
गिला
कोई
नहीं
मसअला
ये
है
कि
मेरा
मसअला
कोई
नहीं
कट
रही
है
ज़िंदगी
बेकार
फ़ुर्सत
में
यूँँ
ही
मश्ग़ला
ये
है
कि
मेरा
मश्ग़ला
कोई
नहीं
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Zohair Ahmad Sahil
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