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Zohair Ahmad Sahil
zeest hai mujhse KHafaa lekin gilaa koii nahin
zeest hai mujhse KHafaa lekin gilaa koii nahin | ज़ीस्त है मुझ सेे ख़फ़ा लेकिन गिला कोई नहीं
- Zohair Ahmad Sahil
ज़ीस्त
है
मुझ
सेे
ख़फ़ा
लेकिन
गिला
कोई
नहीं
मसअला
ये
है
कि
मेरा
मसअला
कोई
नहीं
कट
रही
है
ज़िंदगी
बेकार
फ़ुर्सत
में
यूँँ
ही
मश्ग़ला
ये
है
कि
मेरा
मश्ग़ला
कोई
नहीं
- Zohair Ahmad Sahil
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ज़िंदगी
यूँँही
बहुत
कम
है
मोहब्बत
के
लिए
रूठ
कर
वक़्त
गँवाने
की
ज़रूरत
क्या
है
Unknown
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कितना
भी
दर्द
पिला
दे
ख़ुदा
पी
सकता
हूँ
ज़िन्दगी
हिज्र
से
भर
दे
मिरी
जी
सकता
हूँ
हर
दफ़ा
दिल
पे
ही
खा
के
हुई
है
आदत
ये
बंद
आँखों
से
भी
हर
ज़ख़्म
को
सी
सकता
हूँ
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Faiz Ahmad
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मुझे
चाह
थी
किसी
और
की,
प
मुझे
मिला
कोई
और
है
मेरी
ज़िन्दगी
का
है
और
सच,
मेरे
ख़्वाब
सा
कोई
और
है
तू
क़रीब
था
मेरे
जिस्म
के,
बड़ा
दूर
था
मेरी
रूह
से
तू
मेरे
लिए
मेरे
हमनशीं
कोई
और
था
कोई
और
है
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Avtar Singh Jasser
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कुछ
दिन
से
ज़िंदगी
मुझे
पहचानती
नहीं
यूँँ
देखती
है
जैसे
मुझे
जानती
नहीं
Anjum Rehbar
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चार
दिन
झूठी
बाहों
के
आराम
से
मेरी
बिखरी
हुई
ज़िंदगी
ठीक
है
दोस्ती
चाहे
जितनी
बुरी
हो
मगर
प्यार
के
नाम
पर
दुश्मनी
ठीक
है
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SHIV SAFAR
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गँवाई
किस
की
तमन्ना
में
ज़िंदगी
मैं
ने
वो
कौन
है
जिसे
देखा
नहीं
कभी
मैं
ने
Jaun Elia
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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ज़िंदगी
तू
ने
मुझे
क़ब्र
से
कम
दी
है
ज़मीं
पाँव
फैलाऊँ
तो
दीवार
में
सर
लगता
है
Bashir Badr
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ज़िंदगी
मेरी
मुझे
क़ैद
किए
देती
है
इस
को
डर
है
मैं
किसी
और
का
हो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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ज़िंदगी
ज़िंदा-दिली
का
है
नाम
मुर्दा-दिल
ख़ाक
जिया
करते
हैं
Imam Bakhsh Nasikh
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ग़म
को
वीरान
बनाया
था
कभी
ऐसा
ईमान
बनाया
था
कभी
Zohair Ahmad Sahil
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तुम
से
कोई
शिकायत
नहीं
देखने
की
सियासत
नहीं
चादरों
में
लपेटा
हुआ
मैं
किसी
की
भी
हाजत
नहीं
वापसी
का
तो
इमकान
है
पर
किसी
से
रफ़ाक़त
नहीं
तुम
से
मिलकर
बदल
तो
गया
मुझ
में
कोई
शराफ़त
नहीं
मैं
भला
क्यूँ
उसे
देखता
मेरी
उन
सेे
क़यादत
नहीं
झड़
गए
पत्ते
एहसास
के
अब
किसी
तौर
उलफ़त
नहीं
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Zohair Ahmad Sahil
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ये
डरना
कैसा
डरना
है
जब
मरना
तो
क्या
जीना
है
Zohair Ahmad Sahil
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दुनिया
बदल
रही
है
नगरी
ये
चल
रही
है
सबको
बनाकर
अपना
बातों
से
जल
रही
है
रातों
में
हर
दिए
की
लौ
भी
दहल
रही
है
जो
ज़िंदगी
थी
मेरी
लड़की
फिसल
रही
है
बर्बाद
करके
मुझको
ख़ुद
तो
सँभल
रही
है
यादों
के
इस
चमन
में
कितना
वो
ढल
रही
है
ख़ुशियाँ
मना
रही
थी
मुझ
को
निगल
रही
है
'जोहैर'
क्या
बताएँ
अब
वो
पिघल
रही
है
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Zohair Ahmad Sahil
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ख़्वाबों
की
दिन
रात
मेरी
ग़म
की
ये
बारात
मेरी
आई
मेरे
दिल
में
तो
है
सपनों
की
सौग़ात
मेरी
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Zohair Ahmad Sahil
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