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Zohair Ahmad Sahil
gham ko veeraan banaya tha kabhi
gham ko veeraan banaya tha kabhi | ग़म को वीरान बनाया था कभी
- Zohair Ahmad Sahil
ग़म
को
वीरान
बनाया
था
कभी
ऐसा
ईमान
बनाया
था
कभी
- Zohair Ahmad Sahil
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मेरा
इस
तरह
तू
भला
कर
गया
मेरे
दिल
के
ग़म
की
दवा
कर
गया
न
जाने
गिरा
दिल
में
क्या
दोस्तों
कोई
फिर
से
आँसू
बहाकर
गया
मकीं
था
जो
दिल
में
बुलाओ
उसे
जो
हर
बात
दिल
में
छुपा
कर
गया
दिखाऊँ
मैं
क्या
दर्द
अपना
तुझे
मुझे
हिज्र
तेरा
फ़ना
कर
गया
जहाँ
एक
फंदा
लगा
है
नया
वहीं
पैर
अपना
फँसा
कर
गया
कहानी
वफ़ा
की
अधूरी
रही
यूँँॅं
ही
बस
वो
बातें
बना
कर
गया
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Zohair Ahmad Sahil
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अपनी
मीज़ान
बनाया
था
कभी
ग़म
को
वीरान
बनाया
था
कभी
इक
जहान
उसने
सजाया
था
कभी
हम
को
इंसान
बताया
था
कभी
ख़ैर-ओ-शर
जिस
में
गिने
जा
सकते
ऐसा
मीज़ान
बनाया
था
कभी
जा
के
धरती
पे
बसेरा
कर
लो
उसको
फ़रमान
बनाया
था
कभी
जिस्म
बेकार
था
मेरा
जिस
बिन
वो
मेरी
जान
बनाया
था
कभी
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Zohair Ahmad Sahil
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इक
दिया
था
ग़म
में
सजा
हुआ
अपने
ही
दम
पर
डटा
हुआ
जिस
की
दीद
थी
मेरी
ज़िंदगी
वो
कहीं
पर
है
सजा
हुआ
Zohair Ahmad Sahil
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तुम
से
कोई
शिकायत
नहीं
देखने
की
सियासत
नहीं
चादरों
में
लपेटा
हुआ
मैं
किसी
की
भी
हाजत
नहीं
वापसी
का
तो
इमकान
है
पर
किसी
से
रफ़ाक़त
नहीं
तुम
से
मिलकर
बदल
तो
गया
मुझ
में
कोई
शराफ़त
नहीं
मैं
भला
क्यूँ
उसे
देखता
मेरी
उन
सेे
क़यादत
नहीं
झड़
गए
पत्ते
एहसास
के
अब
किसी
तौर
उलफ़त
नहीं
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Zohair Ahmad Sahil
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ये
डरना
कैसा
डरना
है
जब
मरना
तो
क्या
जीना
है
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