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Zohair Ahmad Sahil
apni mizaan banaya tha kabhi
apni mizaan banaya tha kabhi | अपनी मीज़ान बनाया था कभी
- Zohair Ahmad Sahil
अपनी
मीज़ान
बनाया
था
कभी
ग़म
को
वीरान
बनाया
था
कभी
इक
जहान
उसने
सजाया
था
कभी
हम
को
इंसान
बताया
था
कभी
ख़ैर-ओ-शर
जिस
में
गिने
जा
सकते
ऐसा
मीज़ान
बनाया
था
कभी
जा
के
धरती
पे
बसेरा
कर
लो
उसको
फ़रमान
बनाया
था
कभी
जिस्म
बेकार
था
मेरा
जिस
बिन
वो
मेरी
जान
बनाया
था
कभी
- Zohair Ahmad Sahil
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इक
फ़क़त
आप
की
ख़ुशी
के
लिए
दिल
ने
एहसान
हर
किसी
के
लिए
Zohair Ahmad Sahil
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राज
कितने
छुपाए
हुए
हैं
ख़ून
से
भी
नहाए
हुए
हैं
दिल
की
बस्ती
कहीं
इक
बसी
थी
हम
उसी
के
सताए
हुए
हैं
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Zohair Ahmad Sahil
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दिल
चुरा
कर
गया
दिल
लगा
कर
गया
ग़म
का
नग़्मा
यहाँ
गुनगुना
कर
गया
कोई
तो
राज़
दिल
में
दबाए
वो
था
जो
भी
अपनी
वफ़ा
को
मिटा
कर
गया
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Zohair Ahmad Sahil
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किसी
को
अपना
बना
रहा
हूँ
वफ़ा
को
दिल
से
निभा
रहा
हूँ
ये
हाल
अपना
बता
रहा
हूँ
ज़वाब
तुमको
सुना
रहा
हूँ
बदल
रहा
हूँ
मैं
वक़्त
मेरा
मैं
अपनी
हस्ती
बचा
रहा
हूँ
कभी
तो
ख़ूँ
में
नहा
रहा
था
अभी
मैं
ख़ुद
को
सजा
रहा
हूँ
हमें
कहानी
सुनाओ
क्यूँ
तुम
मैं
दुनिया
अपनी
बसा
रहा
हूँ
ये
बात
सारी
है
निकली
दिल
से
जो
दिल
था
टूटा
बना
रहा
हूँ
जो
हाल
सारा
सुना
रहा
था
उसी
से
मिलने
को
जा
रहा
हूँ
नया
दिया
इक
जला
रहा
हूँ
मैं
घर
को
'जोहैर'
आ
रहा
हूँ
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Zohair Ahmad Sahil
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दुनिया
बदल
रही
है
नगरी
ये
चल
रही
है
सबको
बनाकर
अपना
बातों
से
जल
रही
है
रातों
में
हर
दिए
की
लौ
भी
दहल
रही
है
जो
ज़िंदगी
थी
मेरी
लड़की
फिसल
रही
है
बर्बाद
करके
मुझको
ख़ुद
तो
सँभल
रही
है
यादों
के
इस
चमन
में
कितना
वो
ढल
रही
है
ख़ुशियाँ
मना
रही
थी
मुझ
को
निगल
रही
है
'जोहैर'
क्या
बताएँ
अब
वो
पिघल
रही
है
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Zohair Ahmad Sahil
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