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Zohair Ahmad Sahil
dekha tha ik KHvaab kisi KHvaab men
dekha tha ik KHvaab kisi KHvaab men | देखा था इक ख़्वाब किसी ख़्वाब में
- Zohair Ahmad Sahil
देखा
था
इक
ख़्वाब
किसी
ख़्वाब
में
छू
लिया
था
मैं
उन्हें
आदाब
में
हाथ
उठाया
था
वो
मेरी
तरफ़
देखते
मैं
रह
गया
तालाब
में
ख़ास
है
क्या
जो
मैं
सुनाऊँ
तुम्हें
यार
ही
था
खेल
के
ग़र्क़ाब
में
हारना
था
ही
नहीं
तक़दीर
में
सो
चला
वो
जीत
कर
अहबाब
में
सो
गया
था
वो
कहीं
पर
सहरा
में
जल
गया
'जोहैर'
इस
अलक़ाब
में
- Zohair Ahmad Sahil
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अगर
पीछे
ये
दीवाना
पड़ेगा
तुम्हें
इस
दिल
में
बस
जाना
पड़ेगा
मिरी
आवाज़
पहुँचेगी
ज़हाँ
तक
वहाँ
तक
आपको
आना
पड़ेगा
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बेक़रारी
में
मुझको
सहारा
मिला
मुझ
से
दिलदार
मेरा
दोबारा
मिला
ग़म
की
बेताब
शा
में
बदलने
लगीं
दिल
के
दरिया
को
फिर
से
किनारा
मिला
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दिल
एक
तो
फ़ुन्कारी
है
जिस
पर
शरारत
तारी
है
ये
जो
शिकारी
हैं
नए
इनकी
सदाक़त
प्यारी
है
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Zohair Ahmad Sahil
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इक
फ़क़त
आप
की
ख़ुशी
के
लिए
दिल
ने
एहसान
हर
किसी
के
लिए
Zohair Ahmad Sahil
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किसी
को
अपना
बना
रहा
हूँ
वफ़ा
को
दिल
से
निभा
रहा
हूँ
ये
हाल
अपना
बता
रहा
हूँ
ज़वाब
तुमको
सुना
रहा
हूँ
बदल
रहा
हूँ
मैं
वक़्त
मेरा
मैं
अपनी
हस्ती
बचा
रहा
हूँ
कभी
तो
ख़ूँ
में
नहा
रहा
था
अभी
मैं
ख़ुद
को
सजा
रहा
हूँ
हमें
कहानी
सुनाओ
क्यूँ
तुम
मैं
दुनिया
अपनी
बसा
रहा
हूँ
ये
बात
सारी
है
निकली
दिल
से
जो
दिल
था
टूटा
बना
रहा
हूँ
जो
हाल
सारा
सुना
रहा
था
उसी
से
मिलने
को
जा
रहा
हूँ
नया
दिया
इक
जला
रहा
हूँ
मैं
घर
को
'जोहैर'
आ
रहा
हूँ
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Zohair Ahmad Sahil
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