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Zafar Siddqui
har taraf zulm ki hi khabar hai
har taraf zulm ki hi khabar hai | हर तरफ़ ज़ुल्म की ही ख़बर है
- Zafar Siddqui
हर
तरफ़
ज़ुल्म
की
ही
ख़बर
है
ख़ौफ़
में
जी
रहा
हर
बशर
है
सख़्त
होना
पड़ेगा
हमें
भी
वरना
जीने
की
मुश्किल
डगर
है
हम
भी
क़ाइल
हैं
उन
की
हया
के
उन
की
रहती
जो
नीची
नज़र
है
फ़िक्र
उस
की
करूँगा
हमेशा
उन्सियत
उस
को
मुझ
सेे
अगर
है
इश्क़
कर
के
ज़रा
मुझ
सेे
देखो
जाँ
लुटा
दूँ
ये
क़ौले
ज़फर
है
- Zafar Siddqui
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इस
गए
साल
बड़े
ज़ुल्म
हुए
हैं
मुझ
पर
ऐ
नए
साल
मसीहा
की
तरह
मिल
मुझ
से
Sarfraz Nawaz
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मेरा
क़ातिल
ही
मेरा
मुंसिफ़
है
क्या
मिरे
हक़
में
फ़ैसला
देगा
Sudarshan Fakir
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ज़ुल्म
फिर
ज़ुल्म
है
बढ़ता
है
तो
मिट
जाता
है
ख़ून
फिर
ख़ून
है
टपकेगा
तो
जम
जाएगा
Sahir Ludhianvi
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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किसी
के
तुम
हो
किसी
का
ख़ुदा
है
दुनिया
में
मेरे
नसीब
में
तुम
भी
नहीं
ख़ुदा
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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ज़ालिम
था
वो
और
ज़ुल्म
की
आदत
भी
बहुत
थी
मजबूर
थे
हम
उस
से
मोहब्बत
भी
बहुत
थी
Kaleem Aajiz
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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यूँँ
ही
थोड़ी
मेरी
गज़लों
में
इतना
दुख
होता
है
इस
दुनिया
ने
हम
लड़कों
से
रोने
का
हक़
छीना
है
Harsh saxena
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कोई
भी
रोक
न
पाता,
गुज़र
गया
होता
मेरा
नसीब-ए-मोहब्बत
सँवर
गया
होता
न
आईं
होती
जो
बेग़म
मेरी
अयादत
को
मैं
अस्पताल
की
नर्सों
पर
मर
गया
होता
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Paplu Lucknawi
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तो
डर
रहे
हैं
आप
कहीं
हक़
न
माँग
ले
यानी
कि
सबको
खौफ़
है
औरत
के
नाम
से
Abhishar Geeta Shukla
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ज़ुल्म
की
इंतिहा
बुरी
होगी
सोच
कर
बस
ये
मर
गया
कोई
Zafar Siddqui
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भूख
से
जंग
थी
ज़िन्दगी
की
हार
कर
भूख
से
ख़ुद-कुशी
की
वो
अँधेरों
से
घबरा
गया
है
है
ज़रूरत
उसे
रौशनी
की
हर
गली
जगमगाती
है
देखो
रात
है
कुछ
अलग
मुम्बई
की
नफ़रतों
को
जगह
ही
नहीं
दी
बस
मुहब्बत
की
ही
शा'इरी
की
कह
दिया
उसने
मिलते
ही
दौलत
अब
ज़रूरत
नहीं
है
किसी
की
दुश्मनी
यूँँ
निभाई
है
उसने
दुश्मनों
से
मिरे
दोस्ती
की
मैं
मोहब्बत
से
मिलने
लगा
तो
उसने
भी
नफ़रतों
में
कमी
की
है
ज़फर
लखनऊ
घर
अदब
का
है
यहाँ
क़द्र
दानिश-वरी
की
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Zafar Siddqui
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हुस्न
की
मत
नुमाइश
किया
कीजिए
यूँँ
न
बे-पर्दा
छत
पर
दिखा
कीजिए
Zafar Siddqui
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यूँँ
कोई
बे
वफ़ा
नहीं
होता
बे
सबब
ही
जुदा
नहीं
होता
आ
गए
लोग
कुछ
मदद
करने
हर
कोई
तो
बुरा
नहीं
होता
किस
घड़ी
किस
को
मौत
आ
जाए
ये
किसी
को
पता
नहीं
होता
जंग
दुश्मन
से
जीत
ली
मैंने
हौसला
हो
तो
क्या
नहीं
होता
ऐसे
रस्ते
पे
चल
पड़ा
हूँ
मैं
ख़त्म
ही
रास्ता
नहीं
होता
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Zafar Siddqui
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मुहब्बत
ये
मुहब्बत
वो
मुहब्बत
सिवाए
दर्द-ओ-ग़म
के
कुछ
नहीं
है
Zafar Siddqui
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