kya ghazab hai ye bulbul ik qahr sa dhhaate hain | क्या ग़ज़ब है ये बुलबुल इक क़हर सा ढाते हैं

  - Yousuf Bin Mohammad
क्याग़ज़बहैयेबुलबुलइकक़हरसाढातेहैं
हिज्रमेंविसालोंकेगीतगुनगुनातेहैं
हमनेतेरेबसनेकोदिलमहलबनायाथा
अबवीरानघरकेदीवार-ओ-दरकोढातेहैं
बादबाँहमाराजोआँधियोंमेंखुलताहै
नाख़ुदासफ़ीनेमेंग़र्क़ख़ुदकोपातेहैं
अबकहाँसेदिलबरकामेरेदिलपेजल्वाहो
आईनायेधुँदलाहैअक्सक्यादिखातेहैं
उम्रइकगुज़रजाएतबकोईशिकायतहो
सब्रकरदिलमेरेदैरसेवोआतेहैं
उनकीदिल-परस्तीकबमेरेदिलकोभाजाती
अपनीबे-नियाज़ीसेदिलमिरालुभातेहैं
कैसीयेग़ज़ल-ख़्वानीकौनहैसुख़न-आरा
जोशमेंगदाक्याकुछख़ुदसेबुदबुदातेहैं
  - Yousuf Bin Mohammad
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