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Manish Kumar Gupta
ai qaja kar tu intzaar abhii
ai qaja kar tu intzaar abhii | ऐ क़जा कर तू इंतज़ार, अभी
- Manish Kumar Gupta
ऐ
क़जा
कर
तू
इंतज़ार,
अभी
फ़लसफ़ा-ए-हयात
मुबहम
हैं
- Manish Kumar Gupta
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उदासी
का
सबब
दो
चार
ग़म
होते
तो
कह
देता
फ़ुलाँ
को
भूल
बैठा
हूँ
फ़ुलाँ
की
याद
आती
है
Ashu Mishra
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तेरी
यादों
की
धूप
आने
लगी
है
अभी
खुल
जाएगा
मौसम
हमारा
Subhan Asad
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'अमीर'
अब
हिचकियाँ
आने
लगी
हैं
कहीं
मैं
याद
फ़रमाया
गया
हूँ
Ameer Minai
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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ज़ख़्म
लगे
हैं
कितने
दिल
पर
याद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
शाद
नहीं
हूँ
मैं
तुमको
नाशाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
उम्र
गए
पे
तेरी
सूरत
और
मिरी
आँखें
टकराईं
उम्र
गए
में
सोची
वो
फ़रियाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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कितने
नादाँ
हैं
तेरे
भूलने
वाले
कि
तुझे
याद
करने
के
लिए
उम्र
पड़ी
हो
जैसे
Ahmad Faraz
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ज़रूरत
सब
कराती
है
मोहब्बत
भी
इबादत
भी
नहीं
तो
कौन
बेमतलब
किसी
को
याद
करता
है
Umesh Maurya
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परिन्दे
होते
तो
डाली
पर
लौट
भी
जाते
हमें
न
याद
दिलाओ
कि
शाम
हो
गई
है
Rajesh Reddy
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दरमियाँ
हैं
फ़ासले
ये
जानते
हैं
हम
मगर
रात
भर
फिर
भी
हमें
वो
याद
आती
है
बहुत
Amaan Pathan
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इस
रास्ते
में
जब
कोई
साया
न
पाएगा
ये
आख़िरी
दरख़्त
बहुत
याद
आएगा
Azhar Inayati
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कोई
साया
नज़र
नहीं
आता
कोई
मेरा
नज़र
नहीं
आता
झाँकता
हूँ
मैं
झील
में
तो
मुझे
अक्स
ख़ुद
का
नज़र
नहीं
आता
शह्र
कोहसार
से
भरा
था
ये
अब
तो
ज़र्रा
नज़र
नहीं
आता
मैं
ग़ज़ल
लिक्खूँ
तो
भला
कैसे
कोई
सफ़्हा
नज़र
नहीं
आता
सब
ही
तन्हा
जिसे
समझते
हैं
वो
तो
तन्हा
नज़र
नहीं
आता
ग़ालिबन
बादलों
में
छुप
गया
है
शम्स
उगता
नज़र
नहीं
आता
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Manish Kumar Gupta
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बमुश्किल
जीत
पाऊँगा
मैं
ये
जंग
मेरी
तक़दीर
मुझ
सेे
लड़
रही
है
Manish Kumar Gupta
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काम
पूरा
कर
रही
है
मौत
तो
काम
आधा
कर
रही
है
ज़िंदगी
Manish Kumar Gupta
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बात
कुछ
इस
तरह
कही
जाए
दूर
तक
फिर
वो
गूंजती
जाए
फ़ैसला
हो
ज़रूर
हो
साहब
बात
सबकी
मगर
सुनी
जाए
जिस
तरह
से
चला
गया
है
तू
काश
ये
याद
भी
चली
जाए
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Manish Kumar Gupta
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तुझ
सेे
मेरी
हर
ख़ुशी
है
ज़ीस्त
की
तू
रौशनी
है
तुम
डराओ
मत
क़ज़ा
से
हर
तरफ़
ही
ज़िन्दगी
है
हो
रहा
है
जिस्म
बेजान
रूह
में
अफ़सुर्दगी
है
है
नहीं
कोई
किसी
का
छाई
मुझ
में
बेख़ुदी
है
वस्ल
की
आई
है
शब
आज
दिल
में
मेरे
खलबली
है
क्यूँ
की
तुमने
बेवफ़ाई
आह
इक
दिल
में
दबी
है
कुछ
अलग
है
शौक़
मेरा
ग़ज़लों
से
ही
बंदगी
है
ख़ून
से
लिक्खी
थी
मैंने
जो
ग़ज़ल
तुमने
सुनी
है
मैं
नशा
करता
नहीं
हूँ
फिर
भी
रहती
रिंदगी
है
मौत
के
मरकज़
में
था
मैं
तुम
मिले
तो
ज़िन्दगी
है
कुछ
सही
पहले
नहीं
था
अब
ग़लत
लगता
सही
है
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Manish Kumar Gupta
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