zabaan-e-khalq pe aaya to ik fasana hua | ज़बान-ए-ख़ल्क़ पे आया तो इक फ़साना हुआ

  - Waheed Akhtar
ज़बान-ए-ख़ल्क़पेआयातोइकफ़सानाहुआ
वोलफ़्ज़सौतसदासजोआश्नाहुआ
बला-ए-जाँभीहैजाँ-बख़्शभीहैइश्क़-ए-बुताँ
अजलकोउज़्रमिलाज़ीस्तकोबहानाहुआ
तिरीनिगाहकिरनथीतोमेरादिलशबनम
तिरीनिगहसेभीदिलकामोआ'मलाहुआ
ब-सद-ख़ुलूसरहासाथज़िंदगीभरका
मुक़ाबलाभीज़मानेसेदोस्तानाहुआ
सुनाहैबज़्ममेंतेरीहैतज़्किरामेरा
तिरीवफ़ाकातआरुफ़भीग़ाएबानाहुआ
हमऐसेखोगएआग़ाज़मेंख़बरहीनहीं
किबज़्मउठगईकबख़त्मकबफ़सानाहुआ
हरएकलम्हाकियाक़र्ज़ज़िंदगीकाअदा
कुछअपनाहक़भीथाहमपरवहीअदाहुआ
  - Waheed Akhtar
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy