deewaanon ko manzil ka pata yaad nahin hai | दीवानों को मंज़िल का पता याद नहीं है

  - Waheed Akhtar
दीवानोंकोमंज़िलकापतायादनहींहै
जबसेतिरानक़्श-ए-कफ़-ए-पायादनहींहै
अफ़्सुर्दगी-ए-इश्क़केखुलतेनहींअस्बाब
क्याबातभुलाबैठेहैंक्यायादनहींहै
हमदिल-ज़दगाँजीतेहैंयादोंकेसहारे
हाँमिटगएजिसपरवोअदायादनहींहै
घरअपनातोभूलीहीथीआशुफ़्तगी-ए-दिल
ख़ुद-रफ़्ताकोअबदरभीतिरायादनहींहै
लेतेहैंतिरानामहीयूँँजागतेसोते
जैसेकिहमेंअपनाख़ुदायादनहींहै
येएकहीएहसान-ए-ग़मदोस्तहैक्याकम
बे-मेहरी-ए-दौराँकीजफ़ायादनहींहै
बे-बरसेगुज़रजातेहैंउमडेहुएबादल
जैसेउन्हेंमेराहीपतायादनहींहै
इसबार'वहीद'आपकीआँखेंनहींबरसीं
क्याझूमतीज़ुल्फ़ोंकीघटायादनहींहै
  - Waheed Akhtar
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