kahii shunvaai nahin husn ki mehfil ke KHilaaf | कहीं शुनवाई नहीं हुस्न की महफ़िल के ख़िलाफ़

  - Waheed Akhtar
कहींशुनवाईनहींहुस्नकीमहफ़िलकेख़िलाफ़
गुलक्यूँँहँसतेरहेंशोर-ए-अनादिलकेख़िलाफ़
जान-ओ-ईमाँभीवहीदुश्मन-ए-जान-ओ-ईमाँ
हमगवाहीभीदेंगेकहींक़ातिलकेख़िलाफ़
किसीजादेपेचलोछोड़ेगीतन्हाईसाथ
क़दमउट्ठेंतोकिधरइश्क़कीमंज़िलकेख़िलाफ़
बज़्म-ए-याराँहोकिमयनग़्माकेफ़ैज़ान-ए-सुख़न
सबहैंसाज़िशमेंशरीकउसकीमिरेदिलकेख़िलाफ़
हिज्रमेंजीकेबहलनेकेथेजितनेहीले
वहशतइकसाथरहीहोगएसबमिलकेख़िलाफ़
इसीआग़ोशमेंदमतोड़ेंगीकरमौजें
भागतीफिरतीहैंबेकारहीसाहिलकेख़िलाफ़
अक़्ल-ए-दुनियाकातुम्हेंदा'वाहैबे-वज्ह'वहीद'
दो-क़दमचलनहींसकतेकभीतुमदिलकेख़िलाफ़
  - Waheed Akhtar
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy