zakhm-e-dil ka ho mudaava mujhe manzoor nahin | ज़ख़्म-ए-दिल का हो मुदावा मुझे मंज़ूर नहीं

  - Wafa Niyazi
ज़ख़्म-ए-दिलकाहोमुदावामुझेमंज़ूरनहीं
ज़ीस्तकामेरीसहाराहैयेनासूरनहीं
माँगताहूँमैंतुझेतुझसेनयाहैयेसवाल
बातरद्दकरनागदाकीतेरादस्तूरनहीं
आपजाएँदम-ए-नज़अ'मुझेलेनेको
आपकीशान-ए-करमसेतोयेकुछदूरनहीं
ऐशकेसबहीहैंसामानमुयस्सरलेकिन
मेरासाक़ीनहींवोबादा-ए-मख़्मूरनहीं
आरज़ूदीदकीअर्सेसेदोबाराहैमुझे
एकहीबारमेंजलजाएयेवोतूरनहीं
आपकाजौर-ओ-सितमऔरज़ियादाहोसदा
होइफ़ाक़ाये'वफ़ा'कोमेरीमंज़ूरनहीं
  - Wafa Niyazi
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