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Jaun Elia
aaj ka din bhi aish se guzra
aaj ka din bhi aish se guzra | आज का दिन भी ऐश से गुज़रा
- Jaun Elia
आज
का
दिन
भी
ऐश
से
गुज़रा
सर
से
पाँव
तक
बदन
सलामत
है
- Jaun Elia
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कितने
ऐश
से
रहते
होंगे
कितने
इतराते
होंगे
जाने
कैसे
लोग
वो
होंगे
जो
उस
को
भाते
होंगे
यारो
कुछ
तो
ज़िक्र
करो
तुम
उस
की
क़यामत
बाँहों
का
वो
जो
सिमटते
होंगे
उन
में
वो
तो
मर
जाते
होंगे
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Jaun Elia
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बहुत
सी
हैं
जगह
रहने
कि
यूँँ
तो
मगर
औक़ात
का
अपना
मज़ा
है
Talib Toofani
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वो
तो
सारी
आग
है
चाहे
जहाँ
से
चूम
लो,
हाँ
मगर
माथे
पे
बोसे
का
मज़ा
कुछ
और
है
Alankrat Srivastava
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सदा
ऐश
दौराँ
दिखाता
नहीं
गया
वक़्त
फिर
हाथ
आता
नहीं
Meer Hasan
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मुद्दत
के
बाद
उस
ने
जो
की
लुत्फ़
की
निगाह
जी
ख़ुश
तो
हो
गया
मगर
आँसू
निकल
पड़े
Kaifi Azmi
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जब
फागुन
रंग
झमकते
हों
तब
देख
बहारें
होली
की
और
दफ़
के
शोर
खड़कते
हों
तब
देख
बहारें
होली
की
Nazeer Akbarabadi
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अब
तो
चुप-चाप
शाम
आती
है
पहले
चिड़ियों
के
शोर
होते
थे
Mohammad Alvi
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दोस्तो
क्या
क्या
दिवाली
में
नशात-ओ-ऐश
है
सब
मुहय्या
है
जो
इस
हंगाम
के
शायाँ
है
शय
Nazeer Akbarabadi
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वो
शांत
बैठा
है
कब
से
मैं
शोर
क्यूँँॅं
न
करूँॅं
बस
एक
बार
वो
कह
दे
कि
चुप
तो
चूँ
न
करूँॅं
Charagh Sharma
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ग़म
है
तो
कोई
लुत्फ़
नहीं
बिस्तर-ए-गुल
पर
जी
ख़ुश
है
तो
काँटों
पे
भी
आराम
बहुत
है
Kaleem Aajiz
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किसी
लिबास
की
ख़ुशबू
जब
उड़
के
आती
है
तेरे
बदन
की
जुदाई
बहुत
सताती
है
तेरे
गुलाब
तरसते
हैं
तेरी
ख़ुशबू
को
तेरी
सफ़ेद
चमेली
तुझे
बुलाती
है
तेरे
बग़ैर
मुझे
चैन
कैसे
पड़ता
हैं
मेरे
बगैर
तुझे
नींद
कैसे
आती
है
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Jaun Elia
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ये
तो
बढ़ती
ही
चली
जाती
है
मीआद-ए-सितम
ज़ुज़
हरीफ़ान-ए-सितम
किस
को
पुकारा
जाए
वक़्त
ने
एक
ही
नुक्ता
तो
किया
है
तालीम
हाकिम-ए-वक़त
को
मसनद
से
उतारा
जाए
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Jaun Elia
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मुझे
अब
तुम
से
डर
लगने
लगा
है
तुम्हें
मुझ
से
मोहब्बत
हो
गई
क्या
Jaun Elia
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वो
जो
न
आने
वाला
है
ना
उस
से
मुझ
को
मतलब
था
आने
वालों
से
क्या
मतलब
आते
हैं
आते
होंगे
Jaun Elia
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उस
के
पहलू
से
लग
के
चलते
हैं
हम
कहीं
टालने
से
टलते
हैं
बंद
है
मय-कदों
के
दरवाज़े
हम
तो
बस
यूँँही
चल
निकलते
हैं
मैं
उसी
तरह
तो
बहलता
हूँ
और
सब
जिस
तरह
बहलते
हैं
वो
है
जान
अब
हर
एक
महफ़िल
की
हम
भी
अब
घर
से
कम
निकलते
हैं
क्या
तकल्लुफ़
करें
ये
कहने
में
जो
भी
ख़ुश
है
हम
उस
से
जलते
हैं
है
उसे
दूर
का
सफ़र
दर-पेश
हम
सँभाले
नहीं
सँभलते
हैं
शाम
फ़ुर्क़त
की
लहलहा
उठी
वो
हवा
है
कि
ज़ख़्म
भरते
हैं
है
अजब
फ़ैसले
का
सहरा
भी
चल
न
पड़िए
तो
पाँव
जलते
हैं
हो
रहा
हूँ
मैं
किस
तरह
बर्बाद
देखने
वाले
हाथ
मलते
हैं
तुम
बनो
रंग
तुम
बनो
ख़ुशबू
हम
तो
अपने
सुख़न
में
ढलते
हैं
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Jaun Elia
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