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Jaun Elia
us ke pahluu se lag ke chalte hain
us ke pahluu se lag ke chalte hain | उस के पहलू से लग के चलते हैं
- Jaun Elia
उस
के
पहलू
से
लग
के
चलते
हैं
हम
कहीं
टालने
से
टलते
हैं
बंद
है
मय-कदों
के
दरवाज़े
हम
तो
बस
यूँँही
चल
निकलते
हैं
मैं
उसी
तरह
तो
बहलता
हूँ
और
सब
जिस
तरह
बहलते
हैं
वो
है
जान
अब
हर
एक
महफ़िल
की
हम
भी
अब
घर
से
कम
निकलते
हैं
क्या
तकल्लुफ़
करें
ये
कहने
में
जो
भी
ख़ुश
है
हम
उस
से
जलते
हैं
है
उसे
दूर
का
सफ़र
दर-पेश
हम
सँभाले
नहीं
सँभलते
हैं
शाम
फ़ुर्क़त
की
लहलहा
उठी
वो
हवा
है
कि
ज़ख़्म
भरते
हैं
है
अजब
फ़ैसले
का
सहरा
भी
चल
न
पड़िए
तो
पाँव
जलते
हैं
हो
रहा
हूँ
मैं
किस
तरह
बर्बाद
देखने
वाले
हाथ
मलते
हैं
तुम
बनो
रंग
तुम
बनो
ख़ुशबू
हम
तो
अपने
सुख़न
में
ढलते
हैं
- Jaun Elia
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देख
कर
इंसान
की
बेचारगी
शाम
से
पहले
परिंदे
सो
गए
Iffat Zarrin
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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शाम
ढलने
से
फ़क़त
शाम
नहीं
ढलती
है
उम्र
ढल
जाती
है
जल्दी
पलट
आना
मेरे
दोस्त
Ashfaq Nasir
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जब
सर-ए-शाम
पजीराई-ए-फ़न
होती
है
शाहज़ादी
को
कनीज़ों
से
जलन
होती
है
ले
तो
आया
हूँ
तुझे
घेर
के
अपनी
जानिब
आगे
इंसान
की
अपनी
भी
लगन
होती
है
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Azhar Faragh
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अजब
अंदाज़
के
शाम-ओ-सहर
हैं
कोई
तस्वीर
हो
जैसे
अधूरी
Asad Bhopali
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परिन्दे
होते
तो
डाली
पर
लौट
भी
जाते
हमें
न
याद
दिलाओ
कि
शाम
हो
गई
है
Rajesh Reddy
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तू
है
सूरज
तुझे
मालूम
कहाँ
रात
का
दुख
तू
किसी
रोज़
मेरे
घर
में
उतर
शाम
के
बाद
Farhat Abbas Shah
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शाम
को
जिस
वक़्त
ख़ाली
हाथ
घर
जाता
हूँ
मैं
मुस्कुरा
देते
हैं
बच्चे
और
मर
जाता
हूँ
मैं
Rajesh Reddy
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मसाइल
तो
बहुत
से
हैं
मगर
बस
एक
ही
हल
है
सहरस
शाम
तक
सर
मेरा
है
बेगम
की
चप्पल
है
मेरे
मालिक
भला
इस
सेे
बुरी
भी
क्या
सज़ा
होगी
मेरा
शादीशुदा
होना
ही
दोज़ख़
की
रिहर्सल
है
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Paplu Lucknawi
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'मीर'
से
बैअत
की
है
तो
'इंशा'
मीर
की
बैअत
भी
है
ज़रूर
शाम
को
रो
रो
सुब्ह
करो
अब
सुब्ह
को
रो
रो
शाम
करो
Ibn E Insha
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दिल
में
और
दुनिया
में
अब
नहीं
मिलेंगे
हम
वक़्त
के
हमेशा
में
अब
नहीं
मिलेंगे
हम
Jaun Elia
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जुर्म
में
हम
कमी
करें
भी
तो
क्यूँँ
तुम
सज़ा
भी
तो
कम
नहीं
करते
Jaun Elia
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मेरी
अक्ल-ओ-होश
की
सब
हालतें
तुमने
साँचे
में
जुनूँ
के
ढाल
दी
कर
लिया
था
मैंने
अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़
तुमने
फिर
बाँहें
गले
में
डाल
दी
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Jaun Elia
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नहीं
दुनिया
को
जब
परवाह
हमारी
तो
फिर
दुनिया
की
परवाह
क्यूँँ
करें
हम
Jaun Elia
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जान-लेवा
थीं
ख़्वाहिशें
वर्ना
वस्ल
से
इंतिज़ार
अच्छा
था
Jaun Elia
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