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Vivek Chaturvedi
ye nahin hai ki tu yaad aaya nahin
ye nahin hai ki tu yaad aaya nahin | ये नहीं है की तू याद आया नहीं
- Vivek Chaturvedi
ये
नहीं
है
की
तू
याद
आया
नहीं
ज़िक्र
गर
तेरा
होंठों
पे
लाया
नहीं
क़ोई
उम्मीद
थी
रोशनी
की
नहीं
पर
चराग़ों
को
हम
ने
बुझाया
नहीं
ख़ुद
से
ज़्यादा
भरोसा
था
तुझपे
मुझे
सो
तुझे
हमनें
भी
आज़माया
नहीं
आज
ज़्यादा
परेशाँ
रहेगी
तू
तो
आज
मैंने
तुझे
जो
सताया
नहीं
- Vivek Chaturvedi
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इक
दूसरे
को
छोड़
के
जाने
की
बात
है
अपनी
नहीं
ये
सारे
ज़माने
की
बात
है
बस
यूँँ
समझ
लो
उन
सेे
मेरा
कद
बलंद
है
जिनके
लबों
पे
मुझको
गिराने
की
बात
है
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Kashif Sayyed
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सहने
वाले
को
गर
सब्र
आ
जाए
तो
फिर
समझो
कहने
वालों
की
औक़ात
फ़क़त
दो
कौड़ी
की
है
A R Sahil "Aleeg"
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इस
दुनिया
के
कहने
पर
उम्मीद
न
रक्खो
पत्थर
रख
लो
सीने
पर
उम्मीद
न
रक्खो
Vishal Singh Tabish
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मैं
अब
किसी
की
भी
उम्मीद
तोड़
सकता
हूँ
मुझे
किसी
पे
भी
अब
कोई
ए'तिबार
नहीं
Jawwad Sheikh
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तूफ़ान
की
उम्मीद
थी
आँधी
नहीं
आई
वो
आप
तो
क्या
उस
की
ख़बर
भी
नहीं
आई
शायद
वो
मोहब्बत
के
लिए
ठीक
नहीं
था
शायद
ये
अँगूठी
उसे
पूरी
नहीं
आई
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Khurram Afaq
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झिझकता
हूँ
उसे
इल्ज़ाम
देते
कोई
उम्मीद
अब
भी
रोकती
है
Shariq Kaifi
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वहशत
के
कारखाने
से
ताज़ा
ग़ज़ल
निकाल
ऐ
सब्र
के
दरख़्त
मेरा
मीठा
फल
निकाल
Ammar Iqbal
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किसी
से
कोई
भी
उम्मीद
रखना
छोड़
कर
देखो
तो
ये
रिश्ते
निभाना
किस
क़दर
आसान
हो
जाए
Waseem Barelvi
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दर्द
ऐसा
नजरअंदाज
नहीं
कर
सकते
जब्त
ऐसा
की
हम
आवाज
नहीं
कर
सकते
बात
तो
तब
थी
कि
तू
छोड़
के
जाता
ही
नहीं
अब
तेरे
मिलने
पे
हम
नाज
नहीं
कर
सकते
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Ismail Raaz
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मैं
जंगलों
की
तरफ़
चल
पड़ा
हूँ
छोड़
के
घर
ये
क्या
कि
घर
की
उदासी
भी
साथ
हो
गई
है
Tehzeeb Hafi
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दुश्मनी
थी
फ़क़त
यही
उन
सेे
की
नहीं
दोस्ती
ता-उम्र
उन
सेे
Vivek Chaturvedi
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याद
कर
लेता
हूँ
रोज़
हर
किसी
को
ज़िन्दगी
जाने
कब
इम्तिहान
लेले
Vivek Chaturvedi
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दिल
नहीं
है
मेरा
हर
किसी
के
लिए
वक़्त
मुझको
नहीं
आशिक़ी
के
लिए
इक
तेरी
चाह
है
हर
किसी
को
मगर
तू
बनी
तो
नहीं
हर
किसी
के
लिए
अब
भरोसा
कहाँ
है
किसी
का
यहाँ
ख़तरा
है
आदमी
आदमी
के
लिए
मौत
से
सामना
रोज़
होता
है
अब
रोज़
मरता
हूँ
मैं
ज़िन्दगी
के
लिए
दरिया
हूँ
और
प्यासा
भी
हूँ
यानी
ये
ख़ुद
सबब
हूँ
मैं
अपनी
कमी
के
लिए
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Vivek Chaturvedi
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वो
चाहता
तो
मिटा
देता
मेरे
हाथों
की
लकीरों
को
मेरे
हाथों
की
लकीरें
भी
उसी
के
हाथ
में
थी
Vivek Chaturvedi
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इश्क़
की
राहों
में
गुज़र
के
देखते
हैं
इक
दफ़ा
हम
उनपे
मर
के
देखते
हैं
मैं
बुरा
हूँ
और
दुनिया
कितनी
अच्छी
ये
भी
तो
अब
हम
सुधर
के
देखते
हैं
देखा
था
हमनें
दफ़ा
इक
आँख
भर
के
तब
से
उन्हें
आँख
भर
के
देखते
हैं
वो
बिछाती
है
मेरे
रस्तों
में
पलकें
अपने
रस्तों
में
गुज़र
के
देखतें
हैं
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Vivek Chaturvedi
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