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Kashif Sayyed
ik doosre ko chhod ke jaane ki baat hai
ik doosre ko chhod ke jaane ki baat hai | इक दूसरे को छोड़ के जाने की बात है
- Kashif Sayyed
इक
दूसरे
को
छोड़
के
जाने
की
बात
है
अपनी
नहीं
ये
सारे
ज़माने
की
बात
है
बस
यूँँ
समझ
लो
उन
सेे
मेरा
कद
बलंद
है
जिनके
लबों
पे
मुझको
गिराने
की
बात
है
- Kashif Sayyed
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पूछते
हैं
वो
कि
ग़ालिब
कौन
है
कोई
बतलाओ
कि
हम
बतलाएँ
क्या
Mirza Ghalib
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पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ
था
हर
नग़्मा-ए-कृष्ण
बाँसुरी
का
Hasrat Mohani
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किसे
फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल
है
ये
सवाल
है
कोई
वक़्त
है
भी
कि
जाल
है
ये
सवाल
है
Abbas Qamar
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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अगर
पलक
पे
है
मोती
तो
ये
नहीं
काफ़ी
हुनर
भी
चाहिए
अल्फ़ाज़
में
पिरोने
का
Javed Akhtar
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आधी
रात
की
चुप
में
किस
की
चाप
उभरती
है
छत
पे
कौन
आता
है
सीढ़ियाँ
नहीं
खुलतीं
Parveen Shakir
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शहर
गुम-सुम
रास्ते
सुनसान
घर
ख़ामोश
हैं
क्या
बला
उतरी
है
क्यूँँ
दीवार-ओ-दर
ख़ामोश
हैं
Azhar Naqvi
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उस
लब
से
मिल
ही
जाएगा
बोसा
कभी
तो
हाँ
शौक़-ए-फ़ुज़ूल
ओ
जुरअत-ए-रिंदाना
चाहिए
Mirza Ghalib
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एक
दुख
ये
के
तू
मिलने
नहीं
आया
मुझ
सेे
एक
दुख
ये
के
उस
दिन
मेरा
घर
ख़ाली
था
Tehzeeb Hafi
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बेनतीजा
रह
गईं
दिल्ली
में
सारी
बैठकें
अन्नदाता
खेत
की
मेड़ों
पे
भूखे
मर
गए
Siraj Faisal Khan
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मुफ़लिसी
थी
और
हम
थे
घर
के
इकलौते
चराग़
वरना
ऐसी
रौशनी
करते
कि
दुनिया
देखती
Kashif Sayyed
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उसी
के
नाम
से
हर
काम
का
आग़ाज़
करता
हूँ
जबीं
है
ख़ाक
पर
सो
अर्श
तक
परवाज़
करता
हूँ
मेरे
दुश्मन
भी
मेरी
इस
अदा
पर
दाद
देते
हैं
मैं
इस
अंदाज़
से
उनको
नज़र
अंदाज़
करता
हूँ
मुझे
इक
राज़
से
पर्दा
उठाना
जब
भी
होता
है
किसी
को
राज़दारी
से
शरीक-ए-राज़
करता
हूँ
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Kashif Sayyed
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बह
गई
याद
उसकी
पानी
में
अब
बचा
क्या
है
ज़िंदगानी
में
आप
ने
ग़ौर
से
पढ़ा
ही
नहीं
हम
भी
मौजूद
थे
कहानी
में
काश
तुम
सेे
मिलें
किसी
दिन
यूँँ
जैसे
मिलता
है
पानी
पानी
में
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Kashif Sayyed
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ज़रा
सा
वक़्त
जो
बदला
तो
हम
पे
हँसने
लगे
हमारे
काँधे
पे
सर
रख
के
रोने
वाले
लोग
Kashif Sayyed
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भले
आधा
अधूरा
जी
रहा
है
ये
क्या
कम
है
दीवाना
जी
रहा
है
कभी
फ़ुर्सत
मिले
तो
देख
आकर
तेरा
बीमार
अच्छा
जी
रहा
है
जिसे
मरता
हुआ
छोड़ा
था
तुमने
मेरे
अंदर
वो
लड़का
जी
रहा
है
सभी
को
मौत
का
खटका
है
लेकिन
जिसे
आता
है
जीना
जी
रहा
है
कोई
उस
एक
लम्हे
में
मरा
था
कोई
वो
एक
लम्हा
जी
रहा
है
उसे
तन्हा
न
समझा
जाए
'काशिफ़'
मोहब्बत
में
जो
तन्हा
जी
रहा
है
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Kashif Sayyed
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