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Vishal Singh Tabish
vaqt maazi pe muskurata hai
vaqt maazi pe muskurata hai | वक़्त माज़ी पे मुस्कुराता है
- Vishal Singh Tabish
वक़्त
माज़ी
पे
मुस्कुराता
है
फोन
अब
उस
तरफ़
से
आता
है
उसकी
आवाज़
भी
बला
की
है
और
वो
शे'र
भी
सुनाता
है
वो
मुझे
कुछ
नहीं
समझता
पर
आज
भी
फ़ोन
भी
उठाता
है
दोस्ती
वोस्ती
से
बढ़कर
है
हाँ
भले
दोस्ती
का
नाता
है
- Vishal Singh Tabish
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कोई
चादर
वफ़ा
नहीं
करती
वक़्त
जब
खींच-तान
करता
है
Unknown
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सुब्ह-ए-मग़रूर
को
वो
शाम
भी
कर
देता
है
शोहरतें
छीन
के
गुमनाम
भी
कर
देता
है
वक़्त
से
आँख
मिलाने
की
हिमाकत
न
करो
वक़्त
इंसान
को
नीलाम
भी
कर
देता
है
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Nadeem Farrukh
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तुम्हारे
ख़त
को
जलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
ये
दिल
बाहर
निकलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
तुम्हारा
फ़ैसला
है
पास
रुकना
या
नहीं
रुकना
मेरी
क़िस्मत
बदलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
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Tanoj Dadhich
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आज
भी
'प्रेम'
के
और
'कृष्ण'
के
अफ़्साने
हैं
आज
भी
वक़्त
की
जम्हूरी
ज़बाँ
है
उर्दू
Ata Abidi
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जनम
दिन
पर
घड़ी
दी
थी
उन्होंने
हमें
उम्मीद
थी
वो
वक़्त
देंगे
Harsh saxena
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किसे
है
वक़्त
मोहब्बत
में
दर-ब-दर
भटके
मैं
उसके
शहर
गया
था
किसी
ज़रूरत
से
Riyaz Tariq
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मैंने
जो
कुछ
भी
सोचा
हुआ
है,
मैं
वो
वक़्त
आने
पे
कर
जाऊँगा
तुम
मुझे
ज़हर
लगते
हो
और
मैं
किसी
दिन
तुम्हें
पी
के
मर
जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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वक़्त
बर्बाद
करने
वालों
को
वक़्त
बर्बाद
कर
के
छोड़ेगा
Divakar Rahi
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वो
भी
आख़िर
तिरी
ता'रीफ़
में
ही
ख़र्च
हुआ
मैं
ने
जो
वक़्त
निकाला
था
शिकायत
के
लिए
Azhar Nawaz
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वक़्त
किस
तेज़ी
से
गुज़रा
रोज़-मर्रा
में
'मुनीर'
आज
कल
होता
गया
और
दिन
हवा
होते
गए
Muneer Niyazi
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तेरे
ख़्वाब
सँवर
जाएँ
तो
बेहतर
होगा
अपना
क्या
है
मर
जाएँ
तो
बेहतर
होगा
Vishal Singh Tabish
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ये
ज़माना
ये
दौर
कुछ
भी
नहीं
बस
मोहब्बत
है
और
कुछ
भी
नहीं
Vishal Singh Tabish
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मेरा
किरदार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है,
यह
समझदार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
इश्क़
है
वा'दा
फ़रामोश
नहीं
है
कोई,
दिल
तलबग़ार
मेरी
बात
कहाँ
सुनता
है
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Vishal Singh Tabish
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वो
गले
बदहवा
से
लगते
हैं
उनको
हम
ग़म-शनास
लगते
हैं
इक
ज़माने
की
दूरियाँ
हैं
मगर
दूर
होकर
भी
पास
लगते
हैं
अब
उदासी
ये
हम
पे
जँचती
है
अब
तो
हँसते
उदास
लगते
हैं
हम
में
कमियाँ
तो
लाख
हैं
ताबिश
हम
उसे
फिर
भी
ख़ास
लगते
हैं
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Vishal Singh Tabish
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हमने
सोचा
है
इसके
बारे
में,
कुछ
मुनाफ़ा
है
इस
खसारे
में
मैं
तो
ख़्वाबों
से
तर्क
करता
था,
कुछ
न
कुछ
बात
है
तुम्हारे
में
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Vishal Singh Tabish
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